Thursday, 10 September 2015

अष्‍टावक्र:माहागीता–भाग-1(ओशो) प्रवचन–4

अष्‍टावक्र:माहागीता–भाग-1(ओशो) प्रवचन–4


अहंकार सम्हाले रखता है। यह निरहंकार रोया। अहंकार अपने को सदा नियंत्रण में रखता है। निरहंकार बहता है, उसमें बहाव है।
जे सुलगे ते बुझि गये, बुझे ते सुलगे नाहिं।
रहिमन दाहे प्रेम के, बुझि बुझि के सुलगाहिं।।
अंगारे जलते हैं—जे सुलगे ते बुझि गये—लेकिन एक घड़ी आती है, बुझ जाते हैं, फिर तुम दुबारा उन्हें नहीं जला सकते। राख को किसी ने कभी दुबारा अंगारा बनाने में सफलता पायी?
जे सुलगे ते बुझि गये, बुझे ते सुलगे नाहिं।
फिर एक दफे बुझकर वे कभी नहीं सुलगते। रहिमन दाहे प्रेम के—लेकिन जिनके हृदय में प्रेम का तीर लगा, उनका क्या कहना रहीम!
रहिमन दाहे प्रेम के, बुझि—बुझि के सुलगाहिं।
बार—बार जलते हैं! बार—बार बुझते हैं! फिर—फिर सुलग जाते हैं।
प्रेम की अग्नि शाश्वत है, सनातन है।
जिन्होंने मुझे प्रेम से सुना, वे रो पायेंगे। जिन्होंने मुझे सिर्फ बुद्धि से सुना वे कुछ निष्कर्ष, ज्ञान लेकर जायेंगे। वे राख लेकर जायेंगे—प्रेम का अंगारा नहीं। वे ऐसी राख लेकर जायेंगे जो फिर कभी नहीं सुलगेगी। याद रखना! वह बुझ गयी! वह तो मैंने तुमसे जब कही तब ही बुझ गयी। अगर तुमने बुद्धि में ली तो राख, अगर तुमने हृदय में ले ली तो अंगारा।
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लगी आग, उठे दर्द के राग दिल से
तेरे गम में आतशबया हो गये हम।
खिरद की बदौलत रहे रास्ते में
गुबारे—पसे—कारवा हो गये हम।
लगी आग, उठे दर्द के राग दिल से—वे आंसू आग लग जाने के आंसू थे।
जब किसी को रोते देखो, उसके पास बैठ जाना! वह घड़ी सत्संग की है, वह घड़ी छोड़ने जैसी नहीं। तुम नहीं रो पा रहे तो कम से कम रोते हुए व्यक्ति के पास बैठ जाना। उसका हाथ हाथ में ले लेना, शायद बीमारी तुम्हें भी लग जाये।
लगी आग, उठे दर्द के राग दिल से
आग लग जाये! ये गैरिक वस्त्र आग के प्रतीक है—ये प्रेम की आग के प्रतीक हैं।
तेरे गम में आतशबयां हो गये हम।
और जब तुम्हारे भीतर हृदय में पीड़ा उठेगी, विरह का भाव उठेगा, तुम्हारी श्वास—श्वास में जब अग्नि प्रगट होने लगेगी, आतशबया…!
तेरे गम में आतशबया हो गए हम।
खिरद की बदौलत रहे रास्ते में,
बुद्धि की बदौलत तो रास्ते में भटकते रहे!
खिरद की बदौलत रहे रास्ते में गुबारे—पसे—कारवा हो गये हम।
और बुद्धि के कारण धीरे — धीरे हमारी हालत ऐसी हो गयी, जैसे कारवां गुजरता है, उसके पीछे धूल उड़ती रहती है। हम धूल हो गए।
धूल के अतिरिक्त बुद्धि के हाथ में कभी कुछ लगा नहीं है।
खिरद की बदौलत रहे रास्ते में,
गुबारे—पसे—कारवा हो गये हम।
जो दिल अपना रोशन हुआ कृष्णमोहन
हदें मिट गयीं बेकस हो गए हम।
जो दिल अपना रोशन हुआ कृष्णमोहन—अगर प्रेम में पड़ जाये चोट, हृदय पर लग जाये चोट, खिल जाये वहां आग का अंगारा…..
जो दिल अपना रोशन हुआ कृष्णमोहन
हदें मिट गयीं बेकरा हो गए हम।
उस घड़ी फिर सीमाएं टूट जाती हैं—असीम हो जाते हैं। आंसू असीम की तरफ तुम्हारा पहला कदम है। आंसू इस बात की खबर है कि तुम पिघले, तुम्हारी सख्त सीमाएं थोड़ी पिघली, तुम थोड़े नरम हुए, तुम थोड़े गरम हुए, तुमने ठंडी बुद्धि थोड़ी छोड़ी, थोड़ी आग जली, थोड़ा ताप पैदा हुआ! ये आंसू ठंडे नहीं हैं। ये आंसू बड़े गर्म हैं। और ये आंसू तुम्हारे पिघलने की खबर लाते हैं। जैसे बरफ पिघलती है, ऐसे जब तुम्हारे भीतर की अस्मिता पिघलने लगती है तो आंसू बहते हैं।
कतीले—हवस थे तो आतशनफस थे
मुहब्बत हुई, बेजुबां हो गये हम।
जब बुद्धि से भरे थे, वासनाओं से भरे थे, विचारों से भरे थे तो लाख बातें कीं, जबान बड़ी तेज थी।
कतीले—हवस थे तो आतशनफस थे
मुहब्बत हुई, बेजुबां हो गये हम।
वे आंसू बेजुबान अवस्था की सूचनाएं हैं। जब कुछ ऐसी घटना घटती है कि कहने का उपाय नहीं रह जाता तो न रोओ तो क्या करो? जब जबान कहने में असमर्थ हो जाये तो आंखें आंसुओ से कहती हैं। जब बुद्धि कहने में असमर्थ हो जाये तो कोई नाचकर कहता है। मीरा नाची। कुछ ऐसा हुआ कि कहने को शब्द ने मिले। पद घुंघरू बाध मीरा नाची ३! रोई! जार—जार रोयी! कुछ ऐसा हो गया कि शब्दों में कहना संभव न रहा, शब्द बड़े संकीर्ण मालूम हुए। आंसू ही कह सकते थे—आंसुओ से ही कहा।
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चाहते हो अगर मुझे दिल से
फिर भला किसलिए रुलाते हो?
भक्त सदा परमात्मा से कहते रहे हैं—
चाहते हो अगर मुझे दिल से
फिर भला किसलिए रुलाते हो?
रोशनी के घने अंधेरों में
क्यों नजर से नजर चुराते हो?
पास आये न पास आकर भी
पास मुझको नहीं बुलाते हो?
किसलिए आसपास रहते हो?
किसलिए आसपास आते हो?
अगर तुमने मुझे ठीक से सुना तो तुम्हें परमात्मा बहुत बार, बहुत पास मालूम पड़ेगा।
किसलिए आसपास रहते हो?
किसलिए आसपास आते हो?
पास आये न पास आकर भी
पास मुझको नहीं बुलाते हो?
चाहते हो अगर मुझे दिल से
फिर भला किसलिए रुलाते हो?
रोशनी के घने अंधेरों में
क्यों नजर से नजर चुराते हो?
जो व्यक्ति भाव में उतर रहा है वह बिलकुल इतने करीब है परमात्मा के कि परमात्मा की आंच उसे अनुभव होने लगती है; नजर में नजर पड़ने लगती है; सीमाएं एक—दूसरे के ऊपर उतरने लगती हैं; एक—दूसरे की सीमा में अतिक्रमण होने लगता है।
यहां जो कहा जा रहा है, वह सिर्फ कहने को नहीं है; वह तुम्हें रूपांतरित करने को है। वह सिर्फ बात की बात नहीं है, वह तुम्हें संपूर्ण रूप से, जड़—मूल से बदल देने की बात है।
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एक धरती जली है घनों के लिए
प्यार पैदा हुआ तड़पनों के लिए
मित्र मांगे अगर प्राण तो गम नहीं
प्राण हमने दिये दुश्मनों के लिए।
पापियों ने तो हमको बचाया सदा
पाप हमने किए सज्जनों के लिए।
प्रश्न जब भी मिले सब मुखौटे लगा
उम्र हमको मिली उलझनों लिए।
भीड़ सपनों की हमने उगायी सदा
बंजरों के नगर निर्जनों के लिए।
किन लुटेरों की दुनियां में हम आ गए
हाथ कटते यहां कंगनों के लिए।
जिंदगी ने निचोड़ा है इतना हमें
बेच डाले नयन दर्शनों के लिए।
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चलो अब किसी और के सहारे लोगो
बड़े खुदगर्ज हो गए थे किनारे लोगो।
अब तो किनारे का भी सहारा रखना ठीक नहीं मालूम पड़ता।
चलो अब किसी और के सहारे लोगो
बड़े खुदगर्ज हो गये थे किनारे लोगो।
सहारा समझ कर खड़े हो साये में जिनके
ढह पड़ेगी अचानक वे दीवारें लोगो।
जरूर कछ करीश्‍मा हुआ है आज
खंडहर सेँ ही आ रही है झंकारें लोगो।
उम्मीद की हदें टूटी तो ताज्‍जुब नहीं
म्यान से बाहर हैं तलवारें लोगो।
क्या गुजरेगी सफीने पे, खबर नहीं
अंधड़ मिल गयी हैं पतवारें लोगो।
क्या गुसजरेगी सफीने पे खबर नहीं
अंधड़ मिल गयी हैं पतवारें लोगो।
हजारों बेबस आहें दफन हैं यहां
महज पत्थरों के ढेर नहीं हैं ये मजारें लोगो।

जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह पद्य है और तुम्हारे भीतर प्रार्थना बन सकता है। थोड़ी राह दो। थोडा मार्ग दो। तुम्हारे हृदय की भूमि में यह बीज पड़ जाये तो इसमें फूल निश्चित ही खिलने वाले हैं। यह पद्य ऊपर से प्रगट न हो, लेकिन यह पद्य तुम्हारे भीतर प्रगट होगा। और निश्चित ही जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह मौन से आ रहा है। मौन से ही कहना चाहता हूं, लेकिन तुम सुनने में समर्थ नहीं हो। लेकिन जो मैं तुमसे कह रहा हूं, वह मौन के लिए है; मौन से है और मौन के लिए है। जो शब्द मैं तुमसे कहता हूं वह मेरे शून्य से आ रहा है, शून्य से सरोबोर है। तुम जरा उसे चबाना। तुम उसे जरा चूसना। तुम जरा उसे पचाना। और तुम पाओगे. शब्द तो खो गया, शून्य रह गया। ओशो

अष्‍टावक्र : माहागीता–भाग-1 (ओशो) प्रवचन-3

अष्‍टावक्र : माहागीता–भाग-1 (ओशो) प्रवचन-3

दल के दल तैर रहे मेघ मगन भू पर
उड़ता जाता हूं मैं मेघों के ऊपर।
एक अजब लोक खुला है मेरे आगे
कोई सपना विराट सोये में जागे
कहां उड़ जाता है समय—सिंधु घर—घर!
गाड़ी जो अंधी घाटी में बर्फीली
ऊर्मिल धाराओं में मछली चमकीली
धंसता जाता हूं फेनिल तम के भीतर।
कोसों तक लाल परिधि सूरज को घेरे
छलक रहा इंद्रधनुष पंखों पर मेरे
यहां—वहां फूट रहे रंगों के निर्झर!
ठहरी—सी नदी कहीं उड़ते—से पुल हैं
धाराओं पर धाराएं आकुल—व्याकुल हैं
गल—गल कर बहे जा रहे नभ में थर!
गांवों पर गांव धवल जंगल कासों के
उगते ये तरु अनंत किसकी सांसों के!
एक दूसरी धरती बना हुआ है अंबर
दल के दल तैर रहे मेघ मगन भू पर!
उड़ता जाता हूं मैं मेघों के ऊपर! एक अजब लोक खुला है मेरे आगे! कोई सपना विराट सोये में जागे!
जागो! सपना खूब देखा, अब जागो! बस जागना कुंजी है। कुछ और करना नहीं—न कोई साधना, न कोई योग, न आसन—बस जागना!
हरि ओंम तत्सत्!

जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह पद्य है और तुम्हारे भीतर प्रार्थना बन सकता है। थोड़ी राह दो। थोडा मार्ग दो। तुम्हारे हृदय की भूमि में यह बीज पड़ जाये तो इसमें फूल निश्चित ही खिलने वाले हैं। यह पद्य ऊपर से प्रगट न हो, लेकिन यह पद्य तुम्हारे भीतर प्रगट होगा। और निश्चित ही जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह मौन से आ रहा है। मौन से ही कहना चाहता हूं, लेकिन तुम सुनने में समर्थ नहीं हो। लेकिन जो मैं तुमसे कह रहा हूं, वह मौन के लिए है; मौन से है और मौन के लिए है। जो शब्द मैं तुमसे कहता हूं वह मेरे शून्य से आ रहा है, शून्य से सरोबोर है। तुम जरा उसे चबाना। तुम उसे जरा चूसना। तुम जरा उसे पचाना। और तुम पाओगे. शब्द तो खो गया, शून्य रह गया। ओशो

Wednesday, 9 September 2015

अष्‍टावक्र: माहागीता–भाग-1 (ओशो) प्रवचन–2


अष्‍टावक्र: माहागीता–भाग-1 (ओशो) प्रवचन–2
जो कुछ सुंदर था, प्रेय, काम्य
जो अच्छा, मजा, नया था, सत्य—सार
मैं बीन—बीन कर लाया
नैवेद्य चढ़ाया
पर यह क्या हुआ?
सब पड़ा पड़ा कुम्हलाया
सूख गया, मुर्झाया
कुछ भी तो उसने हाथ बढ़ा कर नहीं लिया!
यूं कहीं तो था लिखा
पर मैंने जो दिया, जो पाया,
जो पिया, जो गिराया,
जो ढाला, जो छलकाया,
जो निथारा, जो छाना
जो उतारा, जो चढ़ाया,
जो जोड़ा, जो तोड़ा, जो छोड़ा
सबका जो कुछ हिसाब रहा,
मैंने देखा कि उसी यज्ञ—ज्वाला में गिर गया
और उसी क्षण मुझे लगा कि
अरे मैं तिर गया!
ठीक है, मेरा सिर फिर गया।
तिरता है आदमी—सिर के फिरने से।
परमात्मा को तुम चढ़ाओ चुन—चुन कर चीजें, अच्छी— अच्छी चीजें—उससे कुछ न होगा, जब तक कि सिर न चढ़े। सुनो फिर :
जो कुछ सुंदर था, प्रेय, काम्य
जो अच्छा, मजा, नया था, सत्य—सार
मैं बीन —बीन कर लाया नैवेद्य चढ़ाया
पर यह क्या हुआ?
सब पड़ा —पड़ा कुम्हलाया
सूख गया, मुर्झाया
कुछ भी तो उसने हाथ बढ़ा कर नहीं लिया।
तुम ले आओ सुंदरतम को खोज कर, बहुमूल्य को खोज कर, चढ़ाओ कोहिनूर—कुम्हलायेंगे! तोड़ो फूल कमल के, गुलाब के, चढाओ—कुम्हलायेगे! एक ही चीज वहां स्वीकार है—वह तुम्हारा सिर; वह तुम्हारा अहंकार; वह तुम्हारी बुद्धि; वह तुम्हारा मन। अलग— अलग नाम हैं; बात एक ही है। वहां चढ़ाओ अपने को।
और उसी क्षण मुझे लगा कि
अरे मैं तिर गया
ठीक है, मेरा सिर फिर गया
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एक धुन की तलाश है मुझे
जो ओठों पर नहीं
शिराओं में मचलती है
लावे—सी दहकती है—
पिघलने के लिए
एक आग की तलाश है मुझे
कि रोम—रोम सीझ उठे
और मैं तार—तार हो जाऊं!
कोई मुझे जाली—जाली बुन दे
कि मैं पारदर्शी हो जाऊं!
एक खुशबू की तलाश है मुझे
कि भारहीन हो, हवा में तैर सकूं
हलकी बारिश की महीन बौछारों में कांप सकूं गहराती सांझ के स्लेटी आसमान पर
चमकना चाहता हूं कुछ देर,
एक शोख रंग की तलाश है मुझे!
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राही रुके हुए सब भीतर का पानी अधहंसा बाहर जमी बरफ है
एक तरफ छाती तक दल—दल अगम
बाढ़ का दरिया एक तरफ है। मनमानी बह रही हवाएं जंगल झुके हुए सब
राही रुके हुए सब।
बंद द्वार, अधखुली खिड़कियां
झांक रहीं कुछ आंखें
सूरज के मुंह पर संध्या की
काली अनगिन तीर सरीखी—सी
चुभती हुई सलाखें अपने चेहरे के पीछे चुप सहमे लुके हुए सब
राही रुके हुए सब! अपने चेहरे के पीछे चुप
सहमे लुके हुए सब
राही रुके हुए सब!
जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह पद्य है और तुम्हारे भीतर प्रार्थना बन सकता है। थोड़ी राह दो। थोडा मार्ग दो। तुम्हारे हृदय की भूमि में यह बीज पड़ जाये तो इसमें फूल निश्चित ही खिलने वाले हैं। यह पद्य ऊपर से प्रगट न हो, लेकिन यह पद्य तुम्हारे भीतर प्रगट होगा। और निश्चित ही जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह मौन से आ रहा है। मौन से ही कहना चाहता हूं, लेकिन तुम सुनने में समर्थ नहीं हो। लेकिन जो मैं तुमसे कह रहा हूं, वह मौन के लिए है; मौन से है और मौन के लिए है। जो शब्द मैं तुमसे कहता हूं वह मेरे शून्य से आ रहा है, शून्य से सरोबोर है। तुम जरा उसे चबाना। तुम उसे जरा चूसना। तुम जरा उसे पचाना। और तुम पाओगे. शब्द तो खो गया, शून्य रह गया। ओशो

Tuesday, 4 August 2015

का सोवै दिन रैन–(प्रवचन–11)




का सोवै दिन रैन–(प्रवचन–11)



दुनिया पै है तारी रंग नया आलम ने भी बदले है चोले
यह किसने अदाए खास से फिर रुखसारे महो अंजुम खोले
और एक हसीन अंगड़ाई की हर जुंबिश से मोती रोले
फिर आज तुम्हें शायद छूकर यह मस्त हवाएं आई हैं।
कुछ दर्दसा है दिल वालों में, कुछ सोज भी है अफसानों में
एहसासेगमेमहरूमी लो बेदार हआ दीवानों में
इक लगजिशेपैहम होने लगी फिकरत के हंसी इवानों में
फिर आज तुम्हें शायद छूकर यह मस्त हवाएं आई हैं।
हर जर्रएआलम रक्सां है, मुशातिए फितरत जोश में है
इक होश की दुनियां मुजतरसी हस्ती के दिलेबदहोश में है
थी जिसकी तमन्ना मुद्दत से जैसे कि वही आगोश में है
फिर आज तुम्हें शायद छूकर यह मस्त हवाएं आई हैं।
है चाक गरेबां गुंच गुल खंदां है गुलिस्तां एक तरफ
आकाश तले हैं शैखोबरहमन खुल्देबदामा एक तरफ
और आलमे सरशारी में हया है आज गजल ख्वां एक तरफ
फिर आज तुम्हें शायद छूकर यह मस्त हवाएं आई हैं।

सूत्र:

माया रंग कुसुम्म महा देखन को नीको।   
मीठो दिन दुई चार, अंत लागत है फीको
कोटिन जतन रह्यो नहीं, एक अंग निज मूल।
ज्यों पतंग उड़ि जायगो, ज्यों माया काफूर।।
नाम के रंग मजीठ, लगै छूटै नहिं भाई।
लचपच रह्यो समाय, सार ता में अधिकाई।।
केती बार धुलाइए, दे दे करड़ा धोए।
ज्यों ज्यों भट्ठी पर दिए, त्यों त्यों उज्ज्वल होय।।
सोवत हो केहि नींद, मूढ मूरख अग्यानी।
भोर भए परभात, अबहि तुम करो पयानी।।
अब हम सांची कहत हैं, उडियो पंख पसार।
छुटि जैहो या रुख ते, तन सरवर के पार।।
नाम झांझरी साजि, बाधि बैठो बैपारी।
बोझ लयो पाषान, मोहि हर लागै भारी।।
मांझ धार भव तखत में, आइ परैगी भीर।
एक नाम केवटिया करि ले, सोई लावै तीर।।
सौ भइया की बांह, तपै दुर्जोधन राना।
परे नरायन बीच, भूमि देते गरबाना।।
जुद्ध रचो कुरुक्षेत्र में, बानन बरसे मेह।
तिनही के अभिमान तें, गिधहुं न खायो देह।।
जोधा आगे उलटपुलट, यह पुहमी करते।
बस नहिं रहते सोय, छिने इक में बल रहते।।
सौ जोजन मरजाद सिंध के, करते एकै फाल।
हाथन पर्वत तौलते, तिन धरि खायो काल।।
ऐसा यह संसार, रहट की जैसे घरियां।
इक रीती फिरि जाय, एक आवै फिरि भरियां।।    
उपजिउपजि विनसत करैं, फिरि जमै गिरास।
यही तमासा देखिकै, मनुवा भयो उदास।।
जैसे कलपि कलपि के, भए हैं गुड की माखी।
चाखन लागी बैठी, लपट गई दोनों पाखी।।
पंख लपेटे सिर धुनै, मन ही मन पछिताय।
वह मलयागिरि छांडि के, यहां कौन विधि आय।।
खेत बिरानो देखि, मृगा एक बन को रीझेव।
नित प्रति चुनि चुनि खाय, बान में इन दिन बीधेव।।
उचकन चाहै बल करै, मन ही मन पछिताय।
अब सो उचकि न पाइहौं, धनी पहूंचो आय।।
कल भी थीं जहनीयतें मजरूह ओहामोगुमा
कुश्तएईहाम है दुनियाए इसा आज भी
कल भी था चश्मेबसीरत पर हिजाबेइफ्तदार
हुर्रियत की रूह है मरिहूनेजिंदा आज भी
कल भी थे जोशोअनाके बास्‍ते दारोरसन
अहलेहक के वास्ते है तेगबुरी आज भी
सीनएगेती से कल भी उठ रहा था इक धुआं
जर्राहाएदहर है शोला बदामां आज भी

 

जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह पद्य है और तुम्हारे भीतर प्रार्थना बन सकता है। थोड़ी राह दो। थोडा मार्ग दो। तुम्हारे हृदय की भूमि में यह बीज पड़ जाये तो इसमें फूल निश्चित ही खिलने वाले हैं। यह पद्य ऊपर से प्रगट न हो, लेकिन यह पद्य तुम्हारे भीतर प्रगट होगा। और निश्चित ही जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह मौन से आ रहा है। मौन से ही कहना चाहता हूं, लेकिन तुम सुनने में समर्थ नहीं हो। लेकिन जो मैं तुमसे कह रहा हूं, वह मौन के लिए है; मौन से है और मौन के लिए है। जो शब्द मैं तुमसे कहता हूं वह मेरे शून्य से आ रहा है, शून्य से सरोबोर है। तुम जरा उसे चबाना। तुम उसे जरा चूसना। तुम जरा उसे पचाना। और तुम पाओगे. शब्द तो खो गया, शून्य रह गया। ओशो

का सोवै दिन रैन–(प्रवचन–10)





इन वचनों को स्मरण रखना:
अगर मैं तिलस्मेतकल्लुम दिखा दू
तरानों से बज्मेसुरैया बना दू
तरबआशना तल्ख आहों को कर दूं
कबाएहवादस के पुर्जे उड़ा दू
अगर चर्ख को अज्म दूं बंदगी का
दरे खाक पर माहेताबां झुका दूं
अगर नग्लएसरमदी छेड़ दूं मैं
खिजां में गुलों को महकना सिखा दू
अजल भी मेरे गम पै आंसू बहाए
अगर नालए जिंदगानी सुना दू
अगर छेड़ दूं साज खिलवत में तेरी
चिरागों को ताके हरम से गिरा दूं
कहो तो बदल दूं निजामेदो आलम
जहन्नम में फूलों की जन्नत बसा दूं
गुलिस्तां का हर फूल दिल बन के महके
अगर एक अश्‍केतमन्‍ना गिरा दूं
शमीमआह कर दूं तो लौ दे जमाना
फजा मुसकरा दे अगर मुसकरा दूं
शरमिदगीएकोशिशेनाकाम कहां तक;
महरूमिएतकदीर का इल्जाम कहां तक?
दुनिया को जरूरत है तेरे इज्मे जवा की
सर गुश्ता रहेगा सिफ्तेजाम कहां तक?
लैलाहककित से भी हो जा कभी दोचार
ख्वाबों की हसी छांव में आराम कहां तक?
रुख गर्दिशेदौरा का पलट सकता है तू खुद
नादां गिलएगर्दिशेऐम्याम कहां तक?
जुजवहम नहीं, कैदेरहोरस्मे जमाना
ऐ ताइरे आजाद! तहेदाम कहां तक?
देख तू सुर्मई आकाश पै तारों का निखार
रात की देवी के माथे पै चुनी है अफ्शां
या कुछ अश्कों के चराग
हैं किसी राहगुजर में लर्जां
आह यह सुर्मई आकाश, यह तारों के शरार
यह मेरे दिल को खयाल आता है
दम अंधेरे में घुटा जाता है
क्यों न ईवानेतसव्बुर में जला लूं शमएं
बरबतोचंगोरबाब
मुंतजिर हैं मेरे मिजराब की एक जुंबिश के
जिंदगी क्यों फकत एक आहेमुसलसल ही रहे
क्यों न बेदार करूं वो नग्मे
वक्त भी सुन के जिन्हें थम जाए
रहगुजारों में ये बहता हुआ जूं
मौत के साए तले सिसकियां भरती है हयात
इस उमड़ते हुए का से किनारा कर लूं
ये सिसकती हुई लाशें, ये हयाते मुर्दा
ये जबीनें जिन्हें सज्दों से नहीं है फुरसत
ये उमंगें जिन्हें फाकों ने कुचल डाला है
यह बिलकती हुई रूहें, ये तड़पते हुए दिल
इन ढकलते हुए अश्कों को चुराकर मैं भी
अपने ईवानेतसस्मृर में गलकर लूं
देखकर रात की देवी का सिंगार
वहम आता है मगर
नग्म:ओ नै का सहारा लेकर
जिंदगी चल भी सकेगी कि नहीं;
इन सितारों की दमकती हुई कदीलों से
रात के दिल की सियाही भी मिटेगी कि नहीं।
आकाश को देखा हैतारों से भरा! ऐसे ही तारों से तुम भी भर सकते हो। रात चुनरी देखी आकाश की! ऐसी ही चुनरी तुम्हारा भी परिधान बन सकती है
देख तू सुर्मई आकाश पै तारों का निखार
रात की देवी के माथे पै चुनी है अफ्शां
रात की देवी के माथे पर चुन्नी है तारों की।
या कुछ अश्कों के चराग। या आंसुओ के टिमटिमाते दीपक। हैं किसी राहगुजर में लर्जा
और यह सुर्मई आकाश यह तारों के शरार
यह मेरे दिल को खयाल आता है
दम अंधेरे में घुटा जाता है
रो सको अगर दिल खोलकर, तो पर्दे उठ जाएं।
ढलकेढलके आंसू ढलके
छलकेछलके सागर छलके
दिल के तकाजे उनके इशारे
बोझलबोझल हल्केहल्के
देखोदेखो दामन उलझा
ठहरोठहरो सागर झलके
उनका तगाफुल उनकी तवज्जा
इक दिल, उस पर लाख तहलके
उनकी तमन्ना, उनकी मुहब्बत
देखो संभल के, देखो संभल के
गम ने उठाए सैकड़ों का
दिल ने बसाए लाख महल के
पल में हंसाओ, पल में रुलाओ
पल में उजाले, पल में धुंधलके
हमने न समझा, तुमने न जाना
दिल ने मचाए लाख तहलके
लाख मनाया, लाख भुलाया
नैन कटोरे भरभर छलके
कितने उलझे कितने सीधे
रस्ते उनके रंगमहल के
कड़ियां झेली पापड़ बेले
का सौवें दिन रैन
झलके अब तो मुखड़ा झलके!
कितने उलझे कितने सीधैरस्ते उनके रंगमहल के!

 

जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह पद्य है और तुम्हारे भीतर प्रार्थना बन सकता है। थोड़ी राह दो। थोडा मार्ग दो। तुम्हारे हृदय की भूमि में यह बीज पड़ जाये तो इसमें फूल निश्चित ही खिलने वाले हैं। यह पद्य ऊपर से प्रगट न हो, लेकिन यह पद्य तुम्हारे भीतर प्रगट होगा। और निश्चित ही जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह मौन से आ रहा है। मौन से ही कहना चाहता हूं, लेकिन तुम सुनने में समर्थ नहीं हो। लेकिन जो मैं तुमसे कह रहा हूं, वह मौन के लिए है; मौन से है और मौन के लिए है। जो शब्द मैं तुमसे कहता हूं वह मेरे शून्य से आ रहा है, शून्य से सरोबोर है। तुम जरा उसे चबाना। तुम उसे जरा चूसना। तुम जरा उसे पचाना। और तुम पाओगे. शब्द तो खो गया, शून्य रह गया। ओशो