अष्टावक्र : माहागीता–भाग-1 (ओशो) प्रवचन-3
दल के दल तैर रहे मेघ मगन भू पर
उड़ता जाता हूं मैं मेघों के ऊपर।
एक अजब लोक खुला है मेरे आगे
कोई सपना विराट सोये में जागे
कहां उड़ जाता है समय—सिंधु घर—घर!
गाड़ी जो अंधी घाटी में बर्फीली
ऊर्मिल धाराओं में मछली चमकीली
धंसता जाता हूं फेनिल तम के भीतर।
कोसों तक लाल परिधि सूरज को घेरे
छलक रहा इंद्रधनुष पंखों पर मेरे
यहां—वहां फूट रहे रंगों के निर्झर!
ठहरी—सी नदी कहीं उड़ते—से पुल हैं
धाराओं पर धाराएं आकुल—व्याकुल हैं
गल—गल कर बहे जा रहे नभ में थर!
गांवों पर गांव धवल जंगल कासों के
उगते ये तरु अनंत किसकी सांसों के!
एक दूसरी धरती बना हुआ है अंबर
दल के दल तैर रहे मेघ मगन भू पर!
उड़ता जाता हूं मैं मेघों के ऊपर! एक अजब लोक खुला है मेरे आगे! कोई सपना विराट सोये में जागे!
जागो! सपना खूब देखा, अब जागो! बस जागना कुंजी है। कुछ और करना नहीं—न कोई साधना, न कोई योग, न आसन—बस जागना!
हरि ओंम तत्सत्!
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