Sunday, 4 September 2016

पद घूंघरू बांध--(प्रवचन--19)


सूत्र:
म्हानें चाकर राखोजीम्हाने चाकर राखोजी।
चाकर रहसूं बाग लगासूंनित उठ दरसन पासूं।
बिन्द्राबन की कुंज गलिन मेंतेरी लीला गासूं।।
चाकरी में दरसन पाऊंसुमिरण पाऊं खरची।
भाव—भगति जागीरी पाऊंतीनों बातां सरसी।।
मोरमुकुट पीताम्बर सोहेगल बैजंती माला।
बिन्द्राबन में धेनु चरावेंमोहन मुरली वाला।।
ऊंचे—ऊंचे महल चिनाऊंबिच—बिच राखूं बारी।
सांवरिया के दरसन पाऊंपहर कुसुंबी सारी।।

जोगी आया जोग करण कूंतप करने संन्यासी।
हरि भजन कूं साधु आयाबिन्द्राबन के बासी।।
मीरा के प्रभु गहर गंभीरासदा रहो जी धीरा।
आधी रात प्रभु दरसन दे हैंप्रेम नदी के तीरा।

रमैया मैं तो थारे रंग राती।
औरों के पिया परदेस बसत हैंलिख लिख भेजें पाती।
मेरे पिया मेरे हृदय बसत हैंरोल करूं दिन—राती।
चूवा चोला पहिर सखी रीमैं झुरमुट रमवा जाती।
झुरमुट में मोहे मोहन मिलियाघाल मिली गलबांथी।
और सखी मद पी—पी मातीमैं बिन पियां ही माती।
प्रेम भठी को मैं मद पीयोछकी फिरूं दिन—राती।
सुरत निरत को दिवलो जोयोमनसा पूरन बाती।
अगम घाणि को तेल सिंचायोबाल रही दिन—राती।
जाऊंनी पहिरिए आऊंनी सासरिएहरिसूं सेन लगाती।
मीरा के प्रभु गिरधर नागरहरि चरणां चित लाती।
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ये जहाने रंगो बू जल्वागाहे आरजू
नाजनीनो दिलनशीं महवशो जौहरा जबीं
गुलरुखो लाला अजार अतरबेज व मुश्कबार
दिल फिरोजो दिल नवाज फितना रेजो फितना साज
इक मुजस्सम अरत आश शोला रेजो बर्क पाश
नूरो निकहत की परी जानो रुहे दिलबरी
हर कोई समझा यही बस अभी मेरी हुई
इसके सब नाजो अदा लुत्फ और मैहरो वफा
वक्फ में मेरे लिए इब्तदाए वक्त से
चार दिन की जिंदगी बस इसी में कट गई
ये अरूसे फितनाकार पास आई बार—बार
खेलती सबसे रही पर किसी की कब हुई
मेहरबां जिस पर हुई जिसकी किस्मत खोल दी
दर हकीकत वो मिटा काम से अपने गया
जो समझते हैं इसे इसको ठुकराते रहे
इक घड़ी इसकी बहार लम्हा भर का बस निखार
रंग लाई है उधार रूप भी है मुस्तआर
रौशनी खुर्शीद की बन गई है चांदनी
जिनको शौके दीद है
उनकी हद खुर्शीद है।
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मेरे जीवन का मरन का साथी
कब कोई मुझसे जुदा होता है
हर नफस साथ मेरे चलता है
हर कदम राहनुमा होता है
बख्श देता है खताएं मेरी
जामने लगजशे पा होता है
वही मंजिल है वही शौके सफर
वही खुद बांगे दिरा होता है
मैं जिसे कहता हूं मेरा—मेरा
सब उसी का तो दिया होता है।
है वही शमे सयाह खानाए दिल
वही आंखों की जया होता है
वही हर मौजे नफस में है रवां
दिल में जो जोशे वफा होता है
दर्दे दिल बन के कभी उठता है
बढ़ के फिर खुद ही दवा होता है
वही पैदा है सकूते लब में
वही नगमों में छुपा होता है
कभी बनता है सकूने साहिल
कभी तूफाने बला होता है
ला इला है वही इल्ला अल्ला है
वही हर बुत में बसा होता है
क्या कहूं हमदमे दैरीना मेरा
मुझसे मिलता है तो क्या होता है
शुक्र सद शुक्र कि मेरे लब पर
न शिकायत न गिला होता है
बेतलब उसकी नजर से मुझको
सागरे कैफ अता होता है।
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किस खाक से हुई है न जाने मेरी सरिश्त
दानिस्ता कुछ गुनाह किए जा रहा हूं मैं
चाहूं तो अपने हाथ से अमृत पिलाए तू
दुख है कि फिर भी जहर पीए जा रहा हूं मैं
ये है कशिश हयात की या खौफ मौत का
जी बुझ चुका है फिर भी जीए जा रहा हूं मैं
मस्ती हुई नसीब बड़ी मुश्किलों के बाद
दामन का चाक फिर भी सीए जा रहा हूं मैं
आया था ले के हसरतें दीदे जमाले दोस्त
दिल में उम्मीद वस्ल लिए जा रहा हूं मैं।
हकदार तो हो तुम अमृत पीने के—और उस प्यारे के हाथ से अमृत पीने के!
चाहूं तो अपने हाथ से अमृत पिलाए तू
दुख है कि फिर भी जहर पीए जा रहा हूं मैं!
लेकिन पी तुम जहर रहे हो।
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मेरी अक्लो खिरद सो गई है
वर्ना ऐसी न कुछ बेहुशी है
बंद है आंख पर देखती है
सो गया जिस्मजां जागती है
रुक गई है मेरी सांस ऐसे
बेखुदी में हवैदा खुदी है
कैसी हालत है मैं क्या कहूं अब
मिट गए गम खुशी ही खुशी है
दूर जुल्मत हुई नूर फैला
चार सूं इक नई रोशनी है
बरकतो रहमते हक की बारिश
हर तरफ हर कहीं हो रही है
बोझ हलका हुआ जिंदगी का
नाचती खेलती जा रही है
रूह खुशियों से लबरेज होकर
सारी दुनिया का मुंह चूमती है
आज हर शै पे छाई है मस्ती
इक मुसर्रत में फितरत बसी है
कोहो दरियाओ शाखो शजर में
देखता हूं कि जां पड़ गई है
जर्रेजर्रे में खुर्शीद लरजां
कतरे—कतरे में दरिया रवी है
जिंदगी इम्बसाते खुदी के
आज एहसास से कांपती है
असले तौहीद है ये नज्जारा
और यही जाने रंगे हुई है।
मेरी अक्लो खिरद सो गई है
वर्ना ऐसी न कुछ बेहुशी है।
आज हर शै पे छाई है मस्ती
इक मुसर्रत में फितरत बसी है
कोहो दरियाओ शाखो शजर में
देखता हूं कि जां पड़ गई है।
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जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह पद्य है और तुम्हारे भीतर प्रार्थना बन सकता है। थोड़ी राह दो। थोडा मार्ग दो। तुम्हारे हृदय की भूमि में यह बीज पड़ जाये तो इसमें फूल निश्चित ही खिलने वाले हैं। यह पद्य ऊपर से प्रगट न हो, लेकिन यह पद्य तुम्हारे भीतर प्रगट होगा। और निश्चित ही जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह मौन से आ रहा है। मौन से ही कहना चाहता हूं, लेकिन तुम सुनने में समर्थ नहीं हो। लेकिन जो मैं तुमसे कह रहा हूं, वह मौन के लिए है; मौन से है और मौन के लिए है। जो शब्द मैं तुमसे कहता हूं वह मेरे शून्य से आ रहा है, शून्य से सरोबोर है। तुम जरा उसे चबाना। तुम उसे जरा चूसना। तुम जरा उसे पचाना। और तुम पाओगे. शब्द तो खो गया, शून्य रह गया। ओशो

Saturday, 3 September 2016

पद घूंघरू बांध--(प्रवचन--18)



वो राग छेड़ तरन्नुम की जो करे तशकील
सुना वो नगमा जो तखलीक सोजो साज करे।
तेरा वजूद हकीकत को दे लबासे मजाज
कि जिसपे फखर बहार काएनात नाज करे।
तेरा गुजर हो चमन को नबीद रंगो बू
गुलों को फस्ले बहारों से बेनियाज करे।
तू ऐसे जी कि जमाना बइख्तयारे तमाम
तेरी गरीबी तेरी बेबसी पे नाज करे।
जिसे शिकायतें हों हुस्न से वो इश्क नहीं
हवस है लालाओ गुल में जो इम्तयाज करे।
कभी जो कहना पड़े कुछ तो ऐसी बात कहो
जो सबको अपने अहले नजर आशनाए राज करे।
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है बका का ख्वाहां तो तालिबे फना हो जा
जिंदगी के मुतलाशी मर्गे आशना हो जा
जीस्त के समझ मानी राज मौत का पा ले
मर के बेनिशां हो जाजी के लापता हो जा।
वस्ले दोस्त के तालब वस्ले दोस्त की खातिर
आरजू हो सरतापा सरबसर दुआ हो जा
ख्वाहिशों से दुनिया की दिल को अपने कर खाली
होके उसका ही रह जा उसकी ही रजा हो जा
दिल में हो खयाल उसका आंख में हो जमाल उसका
गैर के तसव्वर से गैर आशना हो जा
शम्मे हुस्न से इसकी नूरे सिदक कर हासिल
शीशाए मोहब्बत में जल्वाए सफा हो जा
गैर और अपने का खुद ब खुद मिटेगा फरक
या मिटा दे अपना आप या खुद आशना हो जा
हर किसी से उल्फत करहर किसी की खिदमत कर
खादिमे बशर बन कर बंदए खुदा हो जा।
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तू आज तोड़ दे सब बुत उस एक बुत के सिवा
फसादो जंगो जदल तर्क कर मोहब्बत कर
कि आशतीओ मोहब्बत में खुदा की रजा
समझ ले सच्ची इबादत के आज मानी तू
तवहब्मायात के असनाम की न कर पूजा
खुदा को देख मुजस्सम खुदा के बंदों में
खलूसे खिदमते खल्के खुदा की मांग दुआ
यही है जिंदा खुदा जीता जागता माबूद
वो खाली हाथ रहेगा जो इसको पा न सका
इसी के आगे झुका दे सरे नमाज अपना
तू आज तोड़ दे सब बुत इस एक बुत के सिवा।
यही है जिंदा खुदा जीता जागता माबूद
यह जो जीता—जागता अस्तित्व हैयह जो प्रकृति है—यही है परमात्मा।
पूछते हो: "परमात्मा कहां है?'
यहां है!
यही है जिंदा खुदा जीता जागता माबूद
वो खाली हाथ रहेगा जो इसको पा न सका।
इसी के आगे झुका दे सरे नमाज अपना
तू आज तोड़ दे सब बुत इस एक बुत के सिवा। 

आज इतना ही।
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जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह पद्य है और तुम्हारे भीतर प्रार्थना बन सकता है। थोड़ी राह दो। थोडा मार्ग दो। तुम्हारे हृदय की भूमि में यह बीज पड़ जाये तो इसमें फूल निश्चित ही खिलने वाले हैं। यह पद्य ऊपर से प्रगट न हो, लेकिन यह पद्य तुम्हारे भीतर प्रगट होगा। और निश्चित ही जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह मौन से आ रहा है। मौन से ही कहना चाहता हूं, लेकिन तुम सुनने में समर्थ नहीं हो। लेकिन जो मैं तुमसे कह रहा हूं, वह मौन के लिए है; मौन से है और मौन के लिए है। जो शब्द मैं तुमसे कहता हूं वह मेरे शून्य से आ रहा है, शून्य से सरोबोर है। तुम जरा उसे चबाना। तुम उसे जरा चूसना। तुम जरा उसे पचाना। और तुम पाओगे. शब्द तो खो गया, शून्य रह गया। ओशो

Friday, 2 September 2016

पद घूंघरू बांध--(प्रवचन--17)



सूत्र :

झुक आई बदरिया सावन कीसावन की मनभावन की।
सावन में उमग्यो मेरा मनवाभनक सुनी हरि आवन की।
उमड़—घुमड़ चहुं दिस से आएदामण दमक झर लावन की।
नन्हीं—नन्हीं बुंदिया मेहा बरसेसीतल पवन सुहावन की।
मीरा के प्रभु गिरधर नागरआनंद मंगल गावन की।


राणाजीमैं सांवरे रंग राची।
सज सिंगार पद बांध घुंघरूलोकलाज तजि नाची।
गई कुमति लहि साधु संगतिभक्ति रूप भई सांची।
गाय—गाय हरि के गुण निसदिनकाल—ब्याल ते बांची।
उन बिन सब जग खारो लागतऔर बात सब कांची।
मीरा के प्रभु गिरधर नागरभक्ति रसीली जांची।

मीरा को प्रभु सांची दासी बनाओ। झूठे धंधों से मेरा फंदा छुड़ाओ।
लूटे ही लेत विवेक का डेरा। बुधिबल यदपि करूं बहुतेरा।
हाय राम नहिं कछु बस मोरा। मरती बिबस प्रभु धाओ—धाओ।
धर्म उपदेस नित ही सुनती हूं। मन कुचाल से बहु डरती हूं।
सदा साधु सेवा करती हूं। सुमिरण ध्यान में चित्त धरती हूं।
भक्ति मार्ग दासी को दिखाओ। मीरा को प्रभु सांची दासी बनाओ।
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भी तक स्पर्श—संवेदित सुनहली धूप की बालें।
प्रतीक्षा से सतत चित्रित घने हेमंत की छाया
अभी तक सुन रहा आकाश अपने छोर फैला कर
अरुण आलोक के मन में दिवा का गीत गदराया
अभी तक है सहेजे पंछियों की पांत बादल तक
बिछुड़तीबेसंवारीफैलती रेखा सगेपन की
अभी तक है बसाए डूबता दिन वक्र किरणों में
अचिह्नित तलतृणों की राह देखी लय विसर्जन की।
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कसक बढ़—बढ़ के दर्दे दिल का दरमा होती जाती है
खिजां आखिर मेरी रश्के बहारां होती जाती है
जहां में जब से अपने आप को मैंने मिटाया है
यहां हर शै खुशी का मेरी सामां होती जाती है
तेरी चश्मे करम की बिजलियों की मेहरबानी से
जरा सी खाक इश्के मेहरे ताबां होती जाती है
जहां का जर्रा—जर्रा नूरे जल्वा से चमक उट्ठा
जमीं खुर्शीद से बढ़ कर दरक्शां होती जाती है
कसक बढ़—बढ़ के दर्दे दिल का दरमां होती जाती है
खिजां आखिर मेरी रश्के बहारां होती जाती है
दर्द बढ़ते—बढ़ते ही दवा हो जाता है। पीड़ा बढ़ते ही बढ़ते एक ऐसी घड़ी आ जाती है कि उसी पीड़ा में तुम डूब जाते और मिट जाते। वही इलाज है। तुम्हारा मिट जाना तुम्हारा इलाज है। और फिर—
खिजां आखिर मेरी रश्के बहारां होती जाती है
फिर तुम्हारा पतझड़ वसंत में रूपांतरित होने लगता है। फिर गए उमस और धूप के दिन। झुक आई बदरिया सावन की!
जहां में जब से अपने आप को मैंने मिटाया है
खयाल रखनातुम्हारे मिटने में ही सारा राज है। तुम मिटो तो परमात्मा हो जाए। तुम रहो तो परमात्मा मिटा रहेगा। दो में से एक ही हो सकता है। तुम भी और परमात्मा भीऐसा नहीं हो सकता। या तुम या परमात्मा।
जहां में जब से अपने आप को मैंने मिटाया है,
यहां हर शै खुशी का मेरी सामां होती जाती है।
तो फिर हर घटनाहर घड़ी आनंद का आधार बनती जाती है। मिटो भर...फिर आनंद ही आनंद है।
तेरी चश्मे करम की बिजलियों की मेहरबानी से
और तेरी अनुकंपा की जो बिजलियां मुझ पर कौंध रही हैंतेरी कृपा की जो बिजलियां मुझ पर कौंध रही हैं—
तेरी चश्मे करम की बिजलियों की मेहरबानी से
जरा सी खाक इश्के मेहरे ताबां होती जाती है।
यह प्रेम की जो छोटी सी धूल मैं तेरे चरणों में चढ़ाने को ले आया थाइस धूल का कण—कण ऐसी रोशनी से भर गया है कि जैसे सूरज बन गया हो। यह तेरी कृपा की बिजलियों का ही परिणाम है।
जहां का जर्रा—जर्रा नूरे जल्वा से चमक उट्ठा
और जब तक तुम न चमक उठोगे नूरे—जल्वे सेजब तक तुम्हारे भीतर परमात्मा का नूर पूरा प्रकट न होगातब तक तुम्हें उसका नूर बाहर भी दिखाई न पड़ेगा। तुम वही देख सकते होजो तुम हो। तुम अपने से ज्यादा को नहीं देख सकते हो। तुम अपने से पार को नहीं देख सकते हो।
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जो इन आंखों ने देखा क्या बताएं
जो गुजरी दिल पे अपनी क्या सुनाएं
फलक ने ढाए हम पर जुल्म क्या—क्या
जमीं ने हम पे कीं क्या—क्या जफाएं
न पूछ ऐ दोस्त रूदादे गमे दिल
तुझे भी साथ अपने क्यों रूलाएं
तमन्नाओंउम्मीदोंहसरतों के
फिर अब खाबीदा फितने क्यों जगाएं
इसी में मसलहत है चुप रहें हम
जहां में हश्र आखर क्यों उठाएं
इनायत जिसने दर्दे दिल किया है
उसी को देते जाएंगे दुआएं
चमक उठी हैं तेरे नक्शे पासे
जहाने शौक की तारीक राहें
तेरी चश्मे करम की एक झलक से
मिटी हैं आसमां की सब जफाएं
तेरे एक हर्फे जेरे लब से उठें
खलूसे इश्क की सारी वफाएं
दमे जां बख्श से तेरे हुई हैं
मुअत्तर दोनों आलम की फिजाएं
रूखे रोशन अम्बवाजे तबस्सुम
मेरी बख्शी गई हैं सब खताएं
भुला सकते हैं दुनिया की हर इक शै
मोहब्बत को तेरी कैसे भुलाएं!
जब भक्त भगवान के सान्निध्य में आना शुरू होता है तब उसे पता चलता है कि इतने दुख झेलेइतनी पीड़ाएं झेलीं,रास्ते में इतने कांटे चुभेराह में इतने नरक भोगे—लेकिन सब अब भूले जा सकते हैं। उसकी अनुकंपा की एक बूंद भी उन सबको भुला देने के लिए काफी है।
जो इन आंखों ने देखा क्या बताएं
जो गुजरी दिल पे अपने क्या सुनाएं
फलक ने ढाए हम पर जुल्म क्या—क्या
जमीं ने हम पे कीं क्या—क्या जफाएं
न पूछ ऐ दोस्त रूदादे गमे दिल
तुझे भी साथ अपने क्यों रूलाएं।
सब मिट जाता हैजैसे एक दुख—स्वप्न देखा था। उसकी बात भी छेड़ने का मन नहीं रह जाता। भक्त बहुत बार सोचता है कि जब भगवान को मिलेगा तो करेगा सब शिकायतें। खोल कर रख देगा अपनी पीड़ाओं का चिट्ठा। कहेगा: ये तुमने क्यों इतने कष्ट दिएक्यों इतनी तकलीफें दींक्यों ऐसा संसार बनायाक्यों हमारे मन को ऐसा उपद्रवी रूप दियाक्यों इतनी वासनाएं भरींक्योंपूछूंगा...।
स्वभावतः सभी भक्तों के मन में यह भाव होता है कि जिस दिन भगवान मिलेगाकुछ सवाल तो पूछ ही लेने हैं। ऐसा क्यों किया तूनेक्यों इतना दुख भरा संसार बनायातू तो करुणावान हैफिर तूने इतना दुखभरा संसार क्यों बनायातू तो परम रोशनी हैइतना अंधेरा रास्ते पर क्यों घना कियाक्या है हमारा कसूरक्या था हमारा कसूरहमें क्यों दिए ऐसे पाप से भरी हुई वृत्तियों के तूफानहमारे मन में क्यों ऐसी वृत्तियां पैदा कींहमें क्यों इस ढंग से रचा?
लेकिन जब परमात्मा से मिलन होता है तब समझ में आता है—
तमन्नाओंउम्मीदोंहसरतों के
फिर अब खाबीदा फितने क्यों जगाएं
अब उन खोई हुई बातों को क्यों उठानाअब व्यर्थ की बातों का क्यों राग छेड़ना?
इसी में मसहलत है चुप रहें हम
जहां में हश्र आखर क्यों उठाएं
अब बात गई सो गई...।
इनायत जिसने दर्दे दिल किया है
उस क्षण तो परमात्मा से मिलन के क्षण में सब शिकायत खो जाती हैं। उस क्षण तो धन्यवाद उठता है।
इनायत जिसने दर्दे दिल किया है
उसी को देते जाएंगे दुआएं
तब शिकायत नहीं उठतीदुआ उठती है। प्रार्थना उठती है। धन्यवाद उठता है।
चमक उठी हैं तेरे नक्शे पा से
जहाने शौक की तारीक राहें
और तेरे पैरों के चिह्न से सब अंधेरे मिट गए हैं। रास्ते रोशन हो गए हैं।
तेरी चश्मे करम की एक झलक से
तेरी अनुकंपा की एक बिजली कौंधी।
मिटी हैं आसमां की सब जफाएं
सब दुख—दर्द मिट गएसब पीड़ाएं मिट गईंसब नरक समाप्त हो गए। वह जो देखा थाएक दुख—स्वप्न था, jअसलियत न थी।
भुला सकते हैं दुनिया की हर इक शै
मोहब्बत को तेरी कैसे भुलाएं।
वह सब भूल गया। वह सब समाप्त हो गया।

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लाख सदमे उठा रहा हूं मैं
जख्म पर जख्म खा रहा हूं मैं
इस तरह से दिलो जिगर ऐ दोस्त
तेरे काबिल बना रहा हूं मैं
गिन रहा हूं मौत की घड़ियां
जीस्त के दिन बिता रहा हूं मैं
आखिर इक दिन आओगे ऐ दोस्त
आज आओ—बुला रहा हूं मैं
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ग्रहण करती निज सत्य स्वरूप तुम्हारे स्पर्श मात्र से धूल,
कभी बन जाती घट साकारकभी रंजित सुवासमय फूल
और यह शिला खंड निर्जीव शाप से पाता सा उद्धार
शिल्पीहो जाता पाकर स्पर्श एक पल में प्रतिमा साकार
तुम्हारी सांसों का यह खेल जलद में बनते अगणित चित्र
मृत्तिप्रस्तर मेघों का पुंज लिए मैं देख रहा हूं राह
कि शिल्पी आएगा इस ओर पूर्ण करने को मेरी चाह
खिलेंगे किस दिन मेरे फूलप्रकट होगी कब मूर्ति पवित्र,
और मेरे नभ में किस रोज जलद बिहरेंगे बन कर चित्र
शिल्पीजो मुझमें व्याप्त—विलीन किरण वह कब होगी साकार?
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जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह पद्य है और तुम्हारे भीतर प्रार्थना बन सकता है। थोड़ी राह दो। थोडा मार्ग दो। तुम्हारे हृदय की भूमि में यह बीज पड़ जाये तो इसमें फूल निश्चित ही खिलने वाले हैं। यह पद्य ऊपर से प्रगट न हो, लेकिन यह पद्य तुम्हारे भीतर प्रगट होगा। और निश्चित ही जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह मौन से आ रहा है। मौन से ही कहना चाहता हूं, लेकिन तुम सुनने में समर्थ नहीं हो। लेकिन जो मैं तुमसे कह रहा हूं, वह मौन के लिए है; मौन से है और मौन के लिए है। जो शब्द मैं तुमसे कहता हूं वह मेरे शून्य से आ रहा है, शून्य से सरोबोर है। तुम जरा उसे चबाना। तुम उसे जरा चूसना। तुम जरा उसे पचाना। और तुम पाओगे. शब्द तो खो गया, शून्य रह गया। ओशो