Monday, 22 August 2016

पद घूंघरू बांध--(प्रवचन--06)

जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह पद्य है और तुम्हारे भीतर प्रार्थना बन सकता है। थोड़ी राह दो। थोडा मार्ग दो। तुम्हारे हृदय की भूमि में यह बीज पड़ जाये तो इसमें फूल निश्चित ही खिलने वाले हैं। यह पद्य ऊपर से प्रगट न हो, लेकिन यह पद्य तुम्हारे भीतर प्रगट होगा। और निश्चित ही जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह मौन से आ रहा है। मौन से ही कहना चाहता हूं, लेकिन तुम सुनने में समर्थ नहीं हो। लेकिन जो मैं तुमसे कह रहा हूं, वह मौन के लिए है; मौन से है और मौन के लिए है। जो शब्द मैं तुमसे कहता हूं वह मेरे शून्य से आ रहा है, शून्य से सरोबोर है। तुम जरा उसे चबाना। तुम उसे जरा चूसना। तुम जरा उसे पचाना। और तुम पाओगे. शब्द तो खो गया, शून्य रह गया। ओशो

पद घूंघरू बांध--(प्रवचन--06)

मैं पाबगिल हूंसितारों की बात करता हूं,
खिजां जदां हूंबहारों की बात करता हूं।
दबी हुई हैजहां—सोज आग सीने में,
मैं राख हूंपै शरारों की बात करता हूं।
भंवर में है मेरा सफीना हैं बादबां मौजें
तलातमों में किनारों की बात करता हूं।
सबू ओ जाम गुलो नसतरन महो अंजुम
गरीब दिल के सहारों की बात करता हूं
हुई थी जिनसे मोहब्बत की इब्तदाए हसीं
मैं उन लतीफ इशारों की बात करता हूं।
हुई थी जिनसे मोहब्बत की इब्तदाए हसीं
मैं उन लतीफ इशारों की बात करता हूं
किसी के जलवा—ए—रुख का खयाल आते ही
मैं महरो मैं की सितारों की बात करता हूं।
तेरे खयाल से बाबस्तगी का उजरे हसीं
सगुफ्ता ताजा बहारों की बात करता हूं
दुआ करो कि मुझे ताबे दीद मिल जाए
मैं बेवशर हूंनज्जारों की बात करता हूं।
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जाने क्या पिलाया तूनेबड़ा मजा आया
झूम उठी रे मैं मस्तानी दीवानी
पायल नहींघुंघरू नहीं,
छम—छम कैसे होने लगी!
ढूंढो मुझेमैं खोने लगी
हुआ क्या मुझेउई तौबा! मैं न जानी
झूम उठी रे मैं मस्तानी दीवानी
जाने क्या पिलायामुझे बड़ा मजा आया!
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क्या जाने क्या से कर दिया है तूने क्या मुझे
ऐ दोस्त अब तो कुछ भी नहीं सूझता मुझे
क्यों मैं नहीं रहा हूं जमाने के काम का
अब पूछने लगा है जहांक्या हुआ मुझे
हालत बदल गई हैनहीं मैं रहा वो मैं
हालांकि देखने को नहीं कुछ हुआ मुझे
हर दिल का दर्द सौंप दिया मुझ गरीब को
अच्छा सिला ये इश्क का मेरा दिया मुझे
पर्दे हटे नजर से मिटे इम्तयाज सब
कोई नहीं है गैर नजर आ रहा मुझे
रौशन तमाम जिंदगी के रास्ते हुए
सब कुछ मिलामिला जो तेरा नक्शे पा मुझे।
सूझ जाएगीबूझ जाएगी—तुम खोओगे।
हालत बदल गई हैनहीं मैं रहा वो मैं
हालांकि देखने को नहीं कुछ हुआ मुझे
क्यों मैं नहीं रहा हूं जमाने के काम का
अब पूछने लगा है जहांक्या हुआ मुझे।
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जला के राख कर अब मेरे सब खयालों को
खयाल तेरा ही बस एक मेरे सर में रहे
कशिश यह हुस्ने बुतां जिससे मांग लाया है
वही जमाले हकीकी मेरी नजर में रहे
तेरा ही जोर रहे मेरे दस्तो बाजू में
तेरी ही कुव्वते परवाज बालो पर में रहे
मुझे दिखा दे तू शहराए इश्क ऐ दोस्त!
कि सुबह ओ शाम मेरा हर कदम सफर में रहे।
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इश्क का खेल आम है लेकिन
इश्के सादक जहां में आम नहीं
हर तरफ मय ही मय छलकती है
मस्त यकसर करे जोजाम नहीं।
हुस्न की हो रही है रुसवाई
इश्क को अपना एहतराम नहीं
आओ आदाबे इश्क फिर सीखें
सच्ची उलफत हवस का नाम नहीं।
इश्क में अपना खोना है सब कुछ
साजो सामां से कोई काम नहीं।
फिर मिटाना है अपना नामो—निशां
गैर—ए—महबूब कोई नाम नहीं
इससे आगे है इक मकाम ऐसा
जिसका कोई निशानो नाम नहीं
मस्तियां वां बरसती रहती हैं
खुम के खुम एक आध जाम नहीं।
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जबीने शौक को सजदों की आरजू है अभी
अभी ये सिलसिला—ए—इजजो नाज रहने दे
अभी नजर में फसूने जमाल बाकी है
अभी चमन में बहारे मजाज रहने दे
अभी कशिश रुखो गैसू की मिट नहीं पाई
अभी हजूमे तमाशा—ए—नाज रहने दे
अभी पसंद है जामो सबू की हर बंदिश
रसूमे मयकदा है चश्मे नाज रहने दे
अभी बसी है मेरे दिल में आरजू—ए—निशात
रगों में मेरे अभी सोजो साज रहने दे
खलिश में दर्दे मोहब्बत की लुत्फ बाकी है
इलाजे दर्द अभी चारासाज रहने दे
अभी सदा—ए—अनलहक नहीं उठी दिल से
मैं और तू का अभी इम्तियाज रहने दे
कमाले फन है यही पर अभी मेरी खातिर
शिकस्ते आइना आइनासाज रहने दे।
इन पंक्तियों पर ध्यान करना—
जबीने शौक को सजदों की आरजू है अभी
अभी ये सिलसिलाए इजजो नाज रहने दो।

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अभी पीने—पिलाने में रस हैअभी यह मधुशाला खुली रहने दो।
अभी बसी है मेरे दिल में आरजू—ए—निशात
रगों में मेरे अभी साजो साज रहने दे।
अभी मेरे भीतर बजने दो संगीत।
अभी बसी है मेरे दिल में आरजू—ए—निशात
अभी आकांक्षा है। अभी मेरा संगीत छीन मत लो।
खलिश में दर्दे मोहब्बत की लुत्फ बाकी है
और अभी मैंने प्रेम किया नहींअभी मोहब्बत नहीं की।
खलिश में दर्दे मोहब्बत की लुत्फ बाकी है।
इलाजे दर्द अभी चारासाज रहने दे।
तो अभी मेरे इस प्रेम की पीड़ा को हे चिकित्सक दूर न कर! अभी यह पीड़ा रहने दे।
अभी सदा—ए—अनलहक नहीं उठी दिल से
और अभी अनलहक का नादअहं ब्रह्मास्मि का उदघोष—जैसा मंसूर को हुआजैसे उपनिषद के ऋषियों को हुआजैसा बुद्ध—महावीर को हुआ—वैसा अभी मेरे भीतर नहीं उठ रहा है।
अभी सदा—ए—अनलहक नहीं उठी दिल से
मैं और तू का अभी इम्तियाज रहने दे।
अभी इतनी दूरी रहने दो कि मैं मैं रहूंतू तू रहे—और हमारे बीच प्रेम का सेतु बन सके।
कमाले फन है यही पर अभी मेरी खातिर
शिकस्ते आइना आइनासाज रहने दे।
मैं जानता हूं कि यही फन हैयही कमाल है कि टूटे हुए आईने को कोई इस तरह जोड़ दे कि पता भी न चले कि कभी टूटा था...।
कमाले फन है यही पर अभी मेरी खातिर
शिकस्ते आइना आइनासाज रहने दे।
अभी ये टुकड़े आईने के रहने दोमेरी खातिर अभी इन्हें जोड़ो मत।

Sunday, 21 August 2016

पद घुंघरू बांध--(प्रवचन--05)

जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह पद्य है और तुम्हारे भीतर प्रार्थना बन सकता है। थोड़ी राह दो। थोडा मार्ग दो। तुम्हारे हृदय की भूमि में यह बीज पड़ जाये तो इसमें फूल निश्चित ही खिलने वाले हैं। यह पद्य ऊपर से प्रगट न हो, लेकिन यह पद्य तुम्हारे भीतर प्रगट होगा। और निश्चित ही जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह मौन से आ रहा है। मौन से ही कहना चाहता हूं, लेकिन तुम सुनने में समर्थ नहीं हो। लेकिन जो मैं तुमसे कह रहा हूं, वह मौन के लिए है; मौन से है और मौन के लिए है। जो शब्द मैं तुमसे कहता हूं वह मेरे शून्य से आ रहा है, शून्य से सरोबोर है। तुम जरा उसे चबाना। तुम उसे जरा चूसना। तुम जरा उसे पचाना। और तुम पाओगे. शब्द तो खो गया, शून्य रह गया। ओशो

माई री मैं तो लियो गोबिन्दो मोल।
कोई कहै छाने कोई कहै चौड़े लियो री वजंता ढोल।
कोई कहै मुंहगो कोई कहै सुंहगो लियो री तराजू तोल।
कोई कहै कारो कोई कहै गोरोलियो री अमोलिक मोल।
याही कूं सब लोग जाणत हैंलियो री आंखी खोल।
मीरा को प्रभु दरसण दीज्योपूरब जनम के कौल।


मैं गोविन्द गुण गाणा।
राजा रूठै नगरी राखैहरि रूठया कहं जाणा।
राणा भेजा जहर पियालाइमरत करि पी जाणा।
डिबिया में भेज्या ज भुजंगमसालिगराम करि जाणा।
मीरा तो अब प्रेम दीवानीसांवलिया वर पाणा।

पग घुंघरू बांध मीरा नाची रे।
मैं तो मेरे नारायण की आपहि हो गई दासी रे।
लोग कहैं मीरा भई बावरीसास कहैं कुलनासी रे।
विष का प्याला राणाजी भेज्यांपीवत मीरा हांसी रे।
मीरा के प्रभु गिरधर नागरसहज मिले अविनासी रे।
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फिर देखता हूं तो तेरा रूप नजर आता है
और सुनता हूं तो तेरी आवाज सुनता हूं
देखता हूं तो तेरा रूप नजर आता है
और सुनता हूं तो आवाज तेरी सुनता हूं
सोचता हूं तो फकत याद तेरी आती है
जिक्र करता हूं तो मैं जिक्र तेरा करता हूं
खामशी मेरी तेरा नगमाये खाबीदा है
मेरी आवाजजो तू कहता है मैं कहता हूं
जां तो जांजिस्म भी रोशन है तेरी लौ से मेरा
तेरे ही नूर से मैं शमा सिफ्त जलता हूं
भूख लगती है तो लगती है तेरे प्यार की भूख
चरण अमृत से ही मैं प्यास बुझा सकता हूं।
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मेरे तसव्वर में मेरे दिल में मेरी नजर में समा रहे हैं
वो जो हर जल्वाए हसीं को बहारे रंगीं बना रहे हैं
वही बसे हैं सकूते लब में सकूने दिल में सरूरे जां में
वो बनके इक मौजे बेखुदी मुझको अपनी सूरत दिखा रहे हैं
मेरी खामोशी की लै वही है मेरी गजल का वही तरन्नम
वो पर्दाए साजे दिल भी खुद हैं वो इसपे नगमें भी गा रहे हैं।
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कभी वो मेरी रगों में शोला कभी वो पलकों पे मेरी शबनम
कभी वो साहिल पे रक्स में हैं कभी वो तूफां उठा रहे हैं।
वही है कैफे निशाते हस्ती वही है सोजे गुदाजे हस्ती
कहीं बहाते हैं अश्के खूं वो कहीं खड़े मुस्कुरा रहे हैं
इधर खामोशी उधर खामोशी है गुफ्तगू फिर भी हो रही है
वो सुन रहे हैं बचश्मे खंदा बचश्मे नम हम सुना रहे हैं
जो मुस्कुराहट से उनकी उठती हैं नगमाए बेखुदी की मौजें
वही तो बनती हैं शेर मेरे जिन्हें वो खुद गुनगुना रहे हैं
वो बात जिसने जहान सारा है आशना इसको दिल ही दिल में
समझ के हम राजे नाशगुफ्ता जमाने भर से छुपा रहे हैं।
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आरजूए बका नहीं बाकी
दिल में खौफे फना नहीं बाकी
जल्वागर हर तरफ है तू ही तू
कोई तेरे सिवा नहीं बाकी
आलमे रंगो बू नहीं कायम
हस्तिए मासबा नहीं बाकी
कारवां का पता न मंजिल का
राह गुम रहनुमा नहीं बाकी
खत्म किस्सा हुआ मनो तू का
कोई भी माजरा नहीं बाकी
हस्त ही हस्त का है इक एहसास
अब शऊरे फना नहीं बाकी
तुझसे मैंने तुझे जो मांग लिया
और कुछ इलतजा नहीं बाकी
तुझसे मैंने तुझे जो मांग लिया
और कुछ इलतजा नहीं बाकी।
भक्त कहता है: अब और कुछ मांगने को बचा भी नहीं।
तुझसे मैंने तुझे जो मांग लिया
और कुछ इलतजा नहीं बाकी
शौके दीदार तेजतर कर दे
और कोई दुआ नहीं बाकी।
भक्त कहता है: और जरा दिखाई पड़और साफ दिखाई पड़! धुंधलके के बाहर आधुएं के बाहर आ! मेरी आंखों को और रोशन कर! मेरी आंखों को और खोल! मेरे पर्दे को और उठा।
शौके दीदार तेजतर कर दे
मेरी देखने की क्षमता को और चमका दे।
और कोई दुआ नहीं बाकी।
और मेरी कोई प्रार्थना नहीं है।
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न तो दुनिया ही बदलती है न दुनिया वाले
फैज जल्वा से नजर अपनी बदल जाती है
न तअयुन है मकां को न जमां को है करार
जिंदगी कैफे मोहब्बत से सम्हल जाती है
बेखुदी में हमीं हो जाते हैं फितरत से बुलंद
ये नहीं होता कि फितरत ही बदल जाती है
दूर तक फैले हैं आफाक में गम के साए
जिंदगी चीर के इन सबको निकल जाती है
इश्के सद मेहरो दरकशां वो खुदी बनती है
शोलाए हुस्ने तजल्ली में जो ढल जाती है।
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तेरे पास बैठके दो घड़ी तुझे हाले दिल है सुना लिया
मुझे अपना मान न मान तूतुझे मैंने अपना बना लिया
मुझे अपना मान न मान तूतुझे मैंने अपना बना लिया
तेरे पास बैठके दो घड़ी तुझे हाले दिल है सुना लिया
कई तेज गाम भटक गए कई बर्करो हुए लापता
तेरे आस्तां पै जो रुक गए उन्हें आके मंजिल ने पा लिया।
कई तेज गाम भटक गए...
ये नजर का अपनी कसूर है कि हिजाबे जलवा की है खता
कोई एक किरन को तरस गयाकोई चांदनी में नहा लिया।
कई तेज गाम भटक गए कई बर्करो हुए लापता
तेरे आस्तां पै जो रुक गए उन्हें आके मंजिल ने पा लिया।
ये नजर का अपनी कसूर है कि हिजाबे जलवा की है खता
कोई एक किरन को तरस गयाकोई चांदनी में नहा लिया।
मेरे साथ होती न बेखुदी तो भटक गया होता मैं कहीं
मेरी लग्जिशों ने कदम कदम मुझे गुमराही से बचा लिया।
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रोओ उसके लिए—वही प्रार्थना है।
पुकारो उसके लिए—वही साधना है।

आज इतना ही।

Friday, 19 August 2016

पद घूंघरू बांध--(प्रवचन--04)

जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह पद्य है और तुम्हारे भीतर प्रार्थना बन सकता है। थोड़ी राह दो। थोडा मार्ग दो। तुम्हारे हृदय की भूमि में यह बीज पड़ जाये तो इसमें फूल निश्चित ही खिलने वाले हैं। यह पद्य ऊपर से प्रगट न हो, लेकिन यह पद्य तुम्हारे भीतर प्रगट होगा। और निश्चित ही जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह मौन से आ रहा है। मौन से ही कहना चाहता हूं, लेकिन तुम सुनने में समर्थ नहीं हो। लेकिन जो मैं तुमसे कह रहा हूं, वह मौन के लिए है; मौन से है और मौन के लिए है। जो शब्द मैं तुमसे कहता हूं वह मेरे शून्य से आ रहा है, शून्य से सरोबोर है। तुम जरा उसे चबाना। तुम उसे जरा चूसना। तुम जरा उसे पचाना। और तुम पाओगे. शब्द तो खो गया, शून्य रह गया। ओशो

पद घूंघरू बांध--(प्रवचन--04)


वही तो है जिंदगी कि जिसमें अटूट अहसास हो बका का,
है मौत का जिसमें खौफहरदम वह जिंदगी जिंदगी नहीं है।
वही तो है रौशनी हो जिससे दिलो दिमागे बेशर दरकशां
करे जो दीवारो दर को रौशन वह रौशनीरौशनी नहीं है।
वही तो है ताजगी जो दौड़े रगों में मौजे निशात बन कर,
जो आरजो लब को रंग दे बसवो ताजगी ताजगी नहीं है।
वही तो है कैफे हस्त जिसमें पता न हो कैफे हस्त का भी,
है जिसमें एहसास बेखुदी का वो बेखुदी बेखुदी नहीं है।
वही तो है आशकी सरूरे निशाते रहती हो जिसमें हरदम,
हो गम का एहसास जिसमें पैदा वह आशकी आशकी नहीं है।
वही तो है खुद सपुर्दगीजिसमें हे शऊरे खुदी का फना सब,
खयाल अपना हो जिसमें बाकी वो बेदिली बेदिली नहीं है।
वही तो है बंदगी फक्त जो तेरी खुशी के लिए अदा हो,
तलब कि जिसमें हो लाग कुछ भी वो बंदगी बंदगी नहीं है।
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सितारों के जहां तक आ गए हैं
गुबारे कारवां तक आ गए हैं
तलाशे आस्ताने यार में हम
जमीं से आस्मां तक आ गए हैं,
मकान अपना मुअय्यन है न मंजिल,
कहें क्या हम कहां तक आ गए हैं,
फलक की वुसअतों से गुजर कर,
हदूदे ला-मकां तक आ गए हैं,
ये माना हमने वाइज और मोमन
सभी बागे जनां तक आ गए हैं,
मगर ऐसे भी हैं गुमगश्ता कुछ लोग,
जो रब्बे दो जहां तक आ गए हैं
ये माना हमने वाइज और मोमन
सभी बागे जनां तक आ गए हैं।
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ये जामो सबू दे उठा मेरे साकी,
अब आंखों से अपनी पिला मेरे साकी,
पिलाता चला जाजो पीना खता है,
तो होती रहे यह खता मेरे साकी,
मेरी तश्नगी फैज तक तेरे पहुंचे,
बढ़ा और उसको बढ़ा मेरे साकी,
बकाए हयाते खिरद से बचा ले,
मुझे बख्श कैफै फना मेरे साकी,
यही आरजू खत्मे सद आरजू है,
मुझे ऐसा बेखुद बना मेरे साकी,
यही मेरी मंजिल यही मेरा हासिल,
तू कदमों में दे दे मुझको जां मेरे साकी।
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मेरी आंखों ने जो देखा हैदिखलाया नहीं जाता
मेरे दिल ने जो समझा है वो समझाया नहीं जाता
मेरे सर में अजल से गूंजता है राग वहदत का
मगर कुछ बात है ऐसीअभी गाया नहीं जाता
मेरी आंखों में है जल्वा तेरादिल में तेरा मसकन
मगर मुश्किल तो ये हैफिर भी तू पाया नहीं जाता
है तेरे हुस्ने आलम ताब से मुझको शिकायत तो
मगर हरफे शिकायत लब पे भी लाया नहीं जाता
तेरे दम से हुई कायम शबाबो शेर की दुनिया
शबाबो शेर में लेकिन तुझे पाया नहीं जाता।

पद घूंघरू बांध--(प्रवचन--03

जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह पद्य है और तुम्हारे भीतर प्रार्थना बन सकता है। थोड़ी राह दो। थोडा मार्ग दो। तुम्हारे हृदय की भूमि में यह बीज पड़ जाये तो इसमें फूल निश्चित ही खिलने वाले हैं। यह पद्य ऊपर से प्रगट न हो, लेकिन यह पद्य तुम्हारे भीतर प्रगट होगा। और निश्चित ही जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह मौन से आ रहा है। मौन से ही कहना चाहता हूं, लेकिन तुम सुनने में समर्थ नहीं हो। लेकिन जो मैं तुमसे कह रहा हूं, वह मौन के लिए है; मौन से है और मौन के लिए है। जो शब्द मैं तुमसे कहता हूं वह मेरे शून्य से आ रहा है, शून्य से सरोबोर है। तुम जरा उसे चबाना। तुम उसे जरा चूसना। तुम जरा उसे पचाना। और तुम पाओगे. शब्द तो खो गया, शून्य रह गया। ओशो

पद घूंघरू बांध--(प्रवचन--03)

मैं तो गिरधर के घर जाऊं।
गिरधर म्हारो सांचो प्रीतम देखत रूप लुभाऊं।
रैन पड़ै तब ही उठि जाऊं भोर भये उठि आऊं।
रैन-दिना बाके संग खेलूं ज्यूं त्यूं वाहि रिझाऊं।
जो पहिरावै सोई पहरूंजो दे सोई खाऊं।
मेरी उनकी प्रीत पुराणीउन बिन पल न रहाऊं।
जहां बैठावे तित ही बैठूंबेचैं तो बिक जाऊं।
मीरा के प्रभु गिरधर नागरबार-बार बलि जाऊं।


मीरा मगन भई हरि के गुण गाए।
सांप पिटारा राणा भेज्योमीरा हाथ दियो जाए।
न्हाय-धोए जब देखन लागी सालिगराम गई पाए।
जहर का प्याला राणा भेज्योअमृत दीन्ह बनाए।
न्हाय-धोए जब पीवन लागीहो अमर अंचाए।
सूल सेज राणा ने भेजीदीज्यो मीरा सुलाए।
सांझ भई मीरा सोवण लागीमानो फूल बिछाए।
मीरा के प्रभु सदा सहाईराखे बिघन घटाए।
भजन भाव में मस्त डोलतीगिरधर पै बलि जाए
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जैसे हवा में अपने को खोल दिया है इन फूलों ने
आकाश और किरणों और झोंकों को सौंप दिया है अपना रूप
और उन्होंने जैसे अपने में भर कर भी उन्हें छुआ नहीं है
ऐसा नहीं हो सकता क्या तुमसे मेरे प्रति?
नहीं हो सकता शायदऔर इसी का रोना है
या ऐसा भी किसी दिन होना है?
तुम्हारे वातावरण में डाल दी है कितनी बार मैंने अपनी आत्मा
तुमने उसे या तो अपने अंक में ही नहीं लिया
या फिर इतना अधिक खींच लिया हैजितना तुम्हें न पा सकने पर
मैंने जीवन को छाती पर भींच लिया है
क्यों नहीं रह सकते हम परस्पर फूल और आकाश की तरह?
यह नहीं हो सकता शायद और इसी का रोना है
या ऐसा भी किसी दिन होना है?
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तू मुझे बता कि क्या था तू मेरे बयां से पहले,
तेरी थी तो क्या हकीकत थी मेरे गुमां से पहले,
मिला राजे लामकां भी तो मकां की ही आगही से,
न शऊरे लामकां था कहीं भी मकां से पहले,
इसे मैंने ही बसाया इसे मैंने ही सजाया,
यह चमन चमन नहीं था तेरा बागवां से पहले,
न पता था बिजलियों को कोई अपनी मंजिलों का,
यूं ही बस भटक रही थीं मेरे आशियां से पहले,
तेरे जोहए लनतरानी को अयां किया था मैंने,
तेरा जल्वा कब था जल्वा मेरे इम्तहां से पहले,
हुआ है दर्दे दिल से पैदा ये तसब्बरे मुसर्रत,
ये निशाते जहां कहां थीं गमें जावदां से पहले,
न फुगाने नीम शब थी न दुआए सुबहगाही,
तेरा जिक्र तक नहीं था मेरी दास्तां से पहले।
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न फुगाने नीम शब थी...
न तो संध्या को मंदिरों की घंटियां बजती थीं और संध्या की प्रार्थना या नमाज होती थी।
...न दुआए सुबहगाही
और न सुबह की कोई प्रार्थना थी।
तेरा जिक्र तक नहीं था मेरी दास्तां से पहले।
जब तक मेरी कहानी न घटी थीतब तक तेरी किसी को खबर भी न थी,तेरा जिक्र भी नहीं था।
मेरे शौक-ए-बंदगी से बने दैर-औ-हरम सब,
तेरी सजदागाह कहां थी मेरे आस्तां से पहले,
भक्त कभी-कभी जूझता है और वह कहता है कि यह मैंने ही बनाए हैं--ये मंदिर और मस्जिदये गुरुद्वारेये गिरजे।
मेरे शौक-ए-बंदगी से बने दैर-औ-हरम सब
यह मेरा ही प्रेम हैयह मेरी ही पुकार है--जिसने ये सारे मंदिर-मस्जिद बनाए हैं।
तेरी सजदागाह कहां थी मेरे आस्तां से पहले
और जब तक मेरा माथा झुकने को नहीं थातब तक कहां थी तेरी प्रतिमा और कहां था तेरा पूजा-स्थल। कहां था तूतेरा होना मुझसे पहले नहीं हो सकता।
मेरे नक्शे पा से पैदा हुए जिंदगी के रस्ते,
मैं ही गामजन हुआ था यहां कारवां से पहले,
तेरा नाम तेरी हस्ती तेरी अस्ल तेरी सूरत,
ये तमाम लफ्जो मानी थे कहां बयां से पहले
मेरे कहने के पहले इन शब्दों में अर्थ ही क्या था!
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तू पास नहीं मेरे तो कुछ पास नहीं है,
तेरी जो नहीं आस कोई आस नहीं है,
लब पर है हंसी तेरे तो सब कुछ है मुझे रास,
रंजीदा अगर तू है तो कुछ रास नहीं है,
तेरे लिए हूं चाके गरेबां को छुपाए,
दुनिया का तो कुछ इतना मुझे पास नहीं है,
सुन लेते हो तो हो जाती है तसल्ली मेरे दिल की,
रूदादे मोहब्बत मेरी कुछ खास नहीं है,
तुमसे नहीं बाबस्ता मेरी कौन सी उम्मीद
कहने को मुझे तुमसे कोई आस नहीं है।
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राजी हो रजा पर तेरीहुए मजबूर थेहम मुख्तार बने,
ये हार हमारी हार है वोजो जीत को भी शरमाती है।
ये हार हमारी हार है वोजो जीत को भी शरमाती है,
ये नूरे जोहदो तायत हैजो बिजली बन कर गिरता है,
इसियां की काली बदली तो रहमत की घटा बन जाती है।
जो चाहे दुनिया कहने दोतुम अपना काम किए जाओ,
मय्यार जमाने के हिम्मत इंसान की आप बनाती है।
बख्शी है मुसलसल एक तड़प तो इतना एहसां और करो;
हम पर भी नजर वो हो जाए जो दोनों जहां गरमाती है।
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पीए बगैर ही रहता हूं मस्तमेरे लिए
ये जामो वादाओ पैमाना ओ सबू क्या है।
मेरी निगाह में रक्सां है मौजे हुस्ने अजल,
जमाल जोहरा जबीना की आबरू क्या है।
मेरी निगाह में रक्सां है मौजे हुस्ने अजल,
जमाल जोहरा जबीना की आबरू क्या है,
मेरे खयाल से तखलीक है बहारों की,
मैं जानता हूं ये अफ्सूं रंगो बू क्या है।
मेरे खयाल से तखलीक है बहारों की,
मैं जानता हूं ये अफ्सूं रंगो बू क्या है,
मेरे सकूत के पर्दों से राग उठते हैं
तिलस्म हुस्ने बयां सहरे गुफ्तगू क्या है
मेरे सकूत के पर्दों से राग उठते हैं!
मेरे ही शौके तमाशा का इक करश्मा है,
हजूमें जल्वाए अनवार चार-सू क्या है,
बिनाए जीस्त हूं अस्ले निशात है मुझसे,
मेरा ही खेल है तूफाने आरजू क्या है,
मेरे ही कदमों से मिलता है मंजिलों का पता,
ये देख जौके सफर शौके जुस्तजू क्या है,
मेरा मकाने फना है सकूनपर्दाए गैब,
बस इक जहूरे खुदी शौरशे नमूं क्या है,
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गरेबां चाक भी होगा फुगां तक बात आ पहुंची,
वहां तक जा ही पहुंचेगी जो यां तक बात आ पहुंची,
मिटा कर अपनी हस्ती तुझको आखिर पा ही लूंगा मैं,
जलेंगे बालो पर भी आशियां तक बात आ पहुंची,
बनाया था जलाने ही को आखिर आशियां अपना,
चमन में शुक्र है बर्केत्तपां तक बात आ पहुंची,
शरीके कारवां हूं मैं गुबारे कारवां होकर,
मेरे मिटने की मीरे कारवां तक बात आ पहुंची,
मुझे जो मुस्कुरा कर अपने हाथों जाम बख्शा था,
इनायत थी मगर अब दास्तां तक बात आ पहुंची,
चमन वालो उठो आराइशे महफिल का वक्त आया,
खिजां से अब बहारे बेखिजां तक बात आ पहुंची,
सजाएदार हो तजवीज अब मेरे लिए शायद,
जो कह बैठा हूं मैं पीरे मुगां तक बात आ पहुंची।
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