Sunday, 31 May 2015

अष्‍टावक्र: महागीता (भाग--6) प्रवचन--9

मैकदा है यह समझबूझ के पीना ऐं रिंद
कोई गिरते हुए पकड़ेगा न बाजू तेरा
मैकदा है यह.....
ये विचार तो शराब की तरह भुला लेने वाले हैं। शराबघर है। मन मूर्च्छा हैबेहोशी है।
मैकदा है यह समझबूझ के पीना ऐ रिंद
विचार को जब पीने चलो तो बहुत सोच—समझ कर। ओंठ से लगाया कि खतरा है। क्योंकि एक विचार के पीछे दूसरा आ रहा है। एक श्रृंखला है। ऐसी श्रृंखलाजिसका कोई अंत नहीं।
मैकदा है यह समझबूझ के पीना ऐ रिंद
कोई गिरते हुए पकड़ेगा न बाजू तेरा
और अगर विचारों में गिरेतो फिर कोई पकड़ने वाला नहीं है। क्योंकि जो पकड़ सकता थावही गिर गया। जो संभल सकता थावही गिर गया।
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अजीजो सादा ही रहने दो लोह—ए—तुर्बत को
हमीं नहीं तो ये नक्या और निगार क्या होगा
अब कब्र को खोद रहे हैंनक्या कर रहे हैंसुंदर बना रहे हैंहीरे —जवाहरातों से जड़ रहे हैं।
हमीं नहीं तो ये नक्या और निगार क्या होगा
अजीजो सादा ही रहने दो लोह—ए—तुर्बत को
मिट्टी में खुद ही मिल गयेतो अब संगमरमर की भी मजार हो तो क्या सार है! खुद ही न बचेतो अब और कुछ बचने का अर्थ भी क्या होता है!
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हिचकी का तार टूट चुका रूह अब कहां
जंजीर खुलके गिर पड़ी दीवाना छूट गया
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अहबाब के काधे से लहद में उतर आए
किस चैन से सोए हुए हम अपने घर आए
और तब मौत दुश्मन नहीं मालूम होती है।
किस चैन से सोए हुए हम अपने घर आए
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ऐसे कुछ बदल गये हम
बेमानी अब हर मौसम

रंग बरसे या झड़ी लगे
वासंती ज्वार ज्वर जगे
कितु नहीं सरसेंगे अब
सपने पतझार के सगे
सुमनों की हार हो गयी
बदशकल बहार हो गयी
ऐसे कुछ छाया भ्रम—तम
धुंधलाया दिनकर का क्रम
ऐसे कुछ बदल गये हम
बेमानी अब हर मौसम

मन जब उन्मन बेहाल हो
कैसे जीवन निहाल हो
सासों का काफिला लुटा
क्या अबीर क्या गुलाल हो
टेसू के फूल जल रहे
आग में पलास ढल रहे
ऐसे कुछ आख हुई नम
दृष्टि—दृष्टि लगती पुरनम
ऐसे कुछ बदल गये हम
बेमानी अब हर मौसम

फागुनी धमार क्या करें
गूंजता खुमार क्या करें
तार—तार अश्रु से कसा
तान बेशुमार क्या करें
मीडों में भरा क्लेश है
केवल अवरोह शेष है
ऐसे कुछ राग गये थम
मौन हुआ असमय सरगम
ऐसे कुछ बदल गये हम
बेमानी अब हर मौसम
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सच कहा था तूने जाहिद जहर—ए—कातिल है शराब
हम भी कहते थे यही जब तक बहार आयी न थी
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पूछिए मयकशों से लुक—ए—शराब
यह मजा पाकबाज क्या जानें
वे जो पाएंगे शराब वे ही जानेंगे मजा।
यह मजा पाकबाज क्या जानें
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तुझको बरबाद तो होना था बहरहाल खुमार
नाज कर नाज कि उसने तुझे बरबाद किया
इसका रोना नहीं है क्यों तुमने किया दिल बरबाद
इसका गम है कि बहुत देर में बरबाद किया
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हमसे पहले भी मुहब्बत का यही अंजाम था
कैस भी नाशाद था फरहाद भी नाकाम था
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आखिरी जाम में थी बात क्या ऐसी साकी
हो गया पी के जो खामोश वह खामोश रहा
अब आ गये हो तो घबडाओ मत। अब यह पागलपन तुम पर छा रहा है तो डरो मतहिम्मत करोछा जाने दो। इसमें बाधा मत डालना। क्योंकि बहुत हैं जो पास आकर भाग जाते हैं। भाग जाते हैं डर के कारण। लगता है कि खिंचे जा रहे हैं। लगता है कि जल्दी ही अपने बस में न रह जाएंगे। इसके पहले कि बस खो जाएभाग जाते हैं। फिर स्वभावत: जो मुझसे भाग जातेउनको मुझसे भागने के लिए कई तर्क खोजने पड़तेकारण खोजने पड़तेकि क्यों छोड़ आएक्यों भाग आए। अपने को भी धोखा देने के लिए उन्हें कई इंतजाम मानसिक करने पड़ते है—बौद्धिक—कि क्यों भाग आए। लेकिन मैं जानता हूं बड़े —से —बड़ा भय तुम्हें पैदा होगा वह यह कि कहीं ऐसा न हो कि तुम इसमें इतने उलझ जाओ कि फिर इसके बाहर न जा सको।
आखिरी जाम में क्या बात थी ऐसी साकी
हो गया पी के जो खामोश वह खामोश रहा
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दूर से आए थे साकी सुनके मयखाने को हम
पर तरसते ही चले अफसोस पैमाने को हम
अगर पास न आए तो ऐसा ही होगा।
दूर से आए थे साकी सुनके मयखाने को हम
बड़े दूर से खबर सुनी थी मधुशाला की और आए थे।
पर तरसते ही चले अफसोस पैमाने को हम
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खोजती भौतिक क्षितिज आंखें यहां
कब्र से ज्यादा न कीमत ताज की
प्यार के पुख्ता धरातल पर बनाये थे महल
पर बिना आधार की मीनार से ढहते रहे
कहीं घर है न कहीं द्वार जिंदगी तेरा
करें किस ठौर इंतजार जिंदगी तेरा
मौत के पास तलक हाथ खींचकर लायी
मगर मरता न एतबार जिंदगी तेरा
जिस जिंदगी में सिवाय मौत के कुछ नहीं घटताउस पर भी भरोसा किये चले जाते हो! और जिस समर्पण से मृत्यु के माध्यम से भी महाजीवन घटता हैवहां भी डरते हो भयभीत होते होसंकोच करते हो!
जिंदगी है अपने कब्जे में न अपने वश में मौत
आदमी मजबूर है और किस कदर मजबूर है
न जन्म तुम्हारे हाथ में हैन मौत तुम्हारे हाथ में है। सिर्फ एक चीज तुम्हारे हाथ में हैवह है समर्पण। जन्म हो गया,मौत होकर रहेगी। समर्पण तुम चाहो तो हो सकता हैतुम चाहो तो नहीं होगा। सिर्फ एक बात के तुम मालिक होवह है संन्यास।
जिंदगी है अपने कब्जे में न अपने वश में मौत
आदमी मजबूर है और किस कदर मजबूर है
नहींएक स्वतंत्रता भी है। एक बात है जहां मजबूरी नहीं है। वही स्वतंत्रता संन्यास है।

 आज इतना ही।

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अष्‍टावक्र: महागीता--(भाग--6) प्रवचन--10

बचे हैं खंडहर अब तो महज दो—चार सपनों के
न सोचा इस तरह हमको करेगा बेदखल कोई
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श्यामल यमुना से केशों में गंगा करती वास है
भोगी अंचल की छाया में सिसक रहा संन्यास है
मेंहावर—मेहदीकाजल—कंघी गर्व तुझे जिन पर बड़ा
मुट्ठी भर मिट्टी ही केवल इन सबका इतिहास है
नटखट लटका नाग जिसे तुम भाल बिठाए घूमती
अरीएक दिन तुझको ही डस लेगा भरे बाजार में
कोई मोती गूंथ सुहागिन तू अपने गलहार में
मगर विदेशी रूप न बंधनेवाला है श्रृंगार में
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तुम मंद चलो!
ध्वनि के खतरों बिखरे मग में
तुम मंद चलो!
सूझों का पहन कलेवर—सा
बिकलाई का कल जेवर—सा
घुल—घुल आंखों के पानी में
फिर छलक—छलक बन छंद चलो
पर मंद चलो!
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रिंद जो जर्फ उठा लें वहीं कूजा बन जाए
जिस जगह बैठ के पी लें वहीं मयखाना बने
ऐसे पियक्कड़ बनो। ऐसे पीनेवाले बनो। मधुशालाएं खोजना बंद करो। जहां बैठ जाओ वहीं मधुशाला बने। साधारण जल भी पी लो तो अमृत हो जाएऐसे बनो। और ऐसे बनने की कला साक्षी होने की कला है।

आज इतना ही।
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अष्‍टावक्र: महागीता--(भाग--6) प्रवचन--11

 मिट्टी भी हंसती हैऐसा
सुनकर मैं हंसता था पहले
फूलों का परिवार देखकर
अब विश्वास हुआ है मुझको
कितनी कलियों की आंखों में
गूंज रही खुशबू की गीता
कितने फूलों के ओंठों पर
लिखी हुई रंगों की कविता
खुशबू के हस्ताक्षर करती
डोल रहीं तितली—बालाएं
सोन जुही के कानों में कुछ
कहती भंवरों की मालाएं
वासंती घूंघट के भीतर
छिपे हुए हैं मधु के प्याले
मानो रेशम को बस्ती में
खुली पड़ी हों मधुशालाएं
मिट्टी भी हंसती हैऐसा
सुनकर मैं हंसता था पहले
फूलों का परिवार देखकर
अब विश्वास हुआ है मुझको
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प्राणहीन पादप से
लिपट गयी लता
अतीत से कितनी
आगत को ममता
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रूप ढला
रस बहा
संग लगा
रंग रहा
सब ढल जाता हैसब नष्ट हो जाता हैलेकिन रंग लगा रह जाता है। जैसे बगीचे से गुजरेबगीचा तो गुजर गया लेकिन वस्त्रों में थोड़ी बगीचे की सुगंध अटकी रह जाती है। ऐसी स्मृतियां हैं। खिलौने टूटते हैंमरते नहीं
मां ने कहा,
पर बालक रोता रहा
बच्चे का तो खिलौना भी टूट जाए तो वह रोता है। जैसे कोई मृत्यु घट गयी। बच्चे का खिलौना टूट जाए तो रोता है,और ज्ञानी वस्तुत: मौत घट जाएखुद भी मर जाए तो भी नहीं रोता हैआंख पर आंसू नहीं आते हैं। बच्चे को खिलौने में भी लगता है मौत घट गयी और ज्ञानी को वास्तविक मौत में भी लगता है—मौत कैसे घट सकती है!
रति
भोगी की मति
योगी की गति
वही है ऊर्जाअलग— अलग तो नहीं। रति—यह जो काम हैमन की वासना है। भोगी की मति—इसी कामना में भोगी का मन ड़बता रहता है। डुबकियां लगाता रहता है। अब जो तुम कर भी नहीं सकतेउसकी कल्पना में ड़बे हो। जो हो भी नहीं सकताउसकी योजना बना रहे हो। शेखचिल्लीपन छोड़ो।
रति
भोगी की मति
योगी की गति
और योगी यह समझकर कि जो हुआ वह भी व्यर्थ थासपने जैसा आया और गयाअब उसमें क्या रखा! जब था तब भी सपना थासमझदार को। और नासमझ कोजब नहीं है तब भी सच मालूम हो रहा है। तो जिस रति में भोगी ड़ब जाता,बंध जाताउसी रति को समझकर योगी गतिमान हो जाता। रति विरति बने
यही काम्य,
आवृत्ति बने,
यह कामना
और फिर—फिर वही कर लूं जो कियाऐसी आवृत्ति की आकांक्षा का नाम ही कामना है। जो एक बार कर लियाठीक से कर लियादेख लियासमझ लियाउससे सदा के लिए मुक्ति हो जानी चाहिए। लेकिन फिर—फिर करूंइसका मतलब है कि ठीक से किया नहीं।
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बीत गये
प्यारे रतनारे दिन बीत गये
रीत गये
आंखों के खारे छिन रीत गये
अरुणाए अधरों के
मखमल से चुंबन ने
मोड़ दिया पाल
काजल की डोरी से
बंधी—बंधी मछली ने
छोड़ दिया ताल
द्वारे पर
बहरे हरकारे बिन गीत गये
बीत गये
प्यारे रतनारे दिन बीत गये
रीत गये
आंखों के खारे छिन रीत गये
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अभावतुल्य
प्यार की तिलिस्म उपलब्धियो
यहां हूं मैं
यहां फिर मुझे खोजो
मेरे गाते हुए इरादों में।
मनाओ
मेरी आशाओं को मनाओ
कि अभी न रूठे
अभी बहुत कुछ है
जिंदगी के वादों में
आखिर तक आदमी सोचता चला जाता हैअभी कुछ और भोग लेंअभी कुछ और भोग लें। अभी बहुत कुछ है
जिंदगी के वादों में।
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मैं नहीं पिछली अभी झंकार भूला
मैं नहीं पहले दिनों का प्यार भूला
गोद में ले मोद से मुझको लसो तो
आज मन—वीणा प्रिये फिर से कसो तो
मन भूलता ही नहीं। फिर—फिर जवान होता रहता है। फिर—फिर लौटकर तरंगें उठती रहती हैं। फिर—फिर पुराने राग—रंग देख लेने का मन होने लगता है।
अभी तक ढूंढती है उर्वरा सुरगंध फूलों में
सहमकर टूटकर बीती अधूरी बात कानों की
अभी तक है चुराती आंख जैसे चांदनी भू से
अभी तक आड़ ज्यों की त्यों सितारों के मचानों से
नहीं बासे हुए हैं रूप के पगचिह्न कुंजों में
हवाओं पर खिंचे हैं मुग्ध पलकों के झुके साये
समय के गाल पर सूखी नहीं विश्वास की बूंदें
अभी तक शून्यता का वक्ष सांसों से धड़क जाए
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बीत चली संध्या की बेला।
धुंधली प्रतिपल पड़ने वाली
एक रेख में सिमटी लाली
कहती है समाप्त होता है
सतरंगे बादल का मेला।
बीत चली संध्या की बेला।

 अंतरिक्ष में आकुलआतुर
कभी इधर उड़कभी उधर उड़
पंथ नीड़ का खोज रहा है
पिछड़ा पंछी एक अकेला।
बीत चली संध्या की बेला।

 कहती है समाप्त होता है
सतरंगे बादल का मेला।
पंथ नीड़ का खोज रहा है
पिछड़ा पंछी एक अकेला।
बीत चली संध्या की बेला।
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जुनूं के मशरबे —रंगी को इख्तियार करो
खिरद के जामा—ए—कोहना को तार—तार करो
मिले हैं रूठे हुए दोस्त गर्मजोशी से
सलोनी रुत के लिए शुक्रे—कर्दगार करो
जुनू के मशरबे —रंगी को इख्तियार करो
जिंदगी का जो मदमातामस्त उन्मादरंगों से भरा हुआ तोर—तरीका है.।
जुनू के मशरबे —रंगी को इख्तियार करो
यह जो फूलोंपक्षियों की गुनगुनाहट काझरनों के शोर कासमुद्र की लहरों काआकाश के चांद—तारों का जो उन्मत्त उत्सव हैजीवन का यह जो ढंग हैइसे इख्तियार करो।
जुनूं के मशरबे —ली को इख्तियार करो
खिरद के जामा—ए—कोहना को तार—तार करो
यह बुद्धि की बकवास को तोड़ोतार—तार उखाड़ कर अलग कर दो।
खिरद के जामा—ए—कोहना को तार—तार करो
मिले हैं रूठे हुए दोस्त गर्मजोशी से
जैसे बिछड़े हुए दो दोस्त मिल जाते हैं। तो फिर थोड़े ही फिक्र करते अतीत की या भविष्य की। मिले हैं रूठे हुए दोस्त गर्मजोशी से
सलोनी रुत के लिए शुक्रे —कर्दगार करो
तो इस अदभुत ऋतु के लिएइस क्षण के लिए परमात्मा का धन्यवाद करो।
छोड़ो यह फिकर। बहुत बार प्रश्न आते हैं तुम्हारे कि क्या हम पहले भी साथ थेअभी साथ नहीं हो पा रहेऔर पहले भी साथ थे इसकी चिंता में पड़े हो! थे भी साथ तो क्या सारनहीं थे साथ तो क्या फर्कअभी साथ हो लोयह जो दो क्षण हमारे हाथ में हैंसाथ—साथ चल लो। इस क्षण एकात्म सध जाने दो।
जुनूं के मशरबे —रंगी को इख्तियार करो
खिरद के जामा—ए—कोहना को तार—तार करो
मत लाओ बुद्धि की इन बातों को बीच में।
मस्ती ही में पाये दिल हस्ती का इर्फान
ख्वाब में जैसे जाए मिल अनदेखा भगवान
जहां मस्ती हैवहां मंदिर है। और मस्ती तो सदा अभी और यहां होती हैअतीत और भविष्य में नहीं।
मस्ती ही में पाये दिल हस्ती का इर्फान
और जहां तुम ड़ब जाते किसी मस्ती मेंवहीं अस्तित्व के संदेश मिलने शुरू होते हैं।
ख्वाब में जैसे जाए मिल अनदेखा भगवान
और मस्ती में ही पहली दफा अनदेखा दिखायी पड़ताअदृश्य दृश्य होता है।
बस गयी मन में तेरे मस्तमिलन की खुशबू
मेरे एहसास पे छाया रहा तेरा जादू
झूमता फिरता रहा तेरी मधुर यादों में
मुझ पे एक नशे का आलम रहा बेजामो —सुबू
अगर तुम जरा मौका दो मुझेउतरने दो तुम्हारे हृदय मेंतो बिना पीए तुम पर शराब हावी हो जाए। झूमता फिरता रहा तेरी मधुर यादों में
मुझ पे एक नशे का आलम रहा बेजामो—सुबू
बिना पीए एक शराब तुम पर हावी हो जाए।
बस गयी मन में तेरे मस्तमिलन की खुशबू
मेरे एहसास पे छाया रहा तेरा जादू
मत सोच—विचार में पड़ोमत सिद्धात बीच में लाओमेरे और तुम्हारे बीच सिद्धात न होंशास्त्र न होंमेरे और तुम्हारे बीच कोई धारणाकोई तर्क न होंमेरे और तुम्हारे बीच कुछ भी न होएक शून्य का सेतु बन जाएतो छंद उठेतो गीत जगे। और उसी मस्ती में शायद तुम्हें पहली दफे अनुभव हो जीवन के परम सत्य का।
जीवन उत्सव है और उत्सव में ही हम जान पाते हैं कि जीवन क्या है।

 आज इतना ही।

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अष्‍टावक्र: महागीता--(भाग--6) प्रवचन--12

मैंने तो सोचा था अपनी
सारी उमर तुझे दे दूंगा
इतनी दूर मगर थी मंजिल
चलते —चलते शाम हो गयी
निकला तो मैं था गुदड़ी में
लाल छिपाए बरन—बरन के
कुछ संग खेले थे बचपन के
कुछ संग सोये थे यौवन के
कुछ पर रीझ गयी थीं कलियां
कुछ पर झूम गयी थीं गलियां
कुछ थे रत्न अमोल हृदय के
कुछ थे नौलख हार नयन के
किंतु ठगौरी डाल गयी कुछ
ऐसी पथ की भूलभुलैया
जनम—जनम की जमा खो गयी
जुग—जुग नींद हराम हो गयी
मैंने तो सोचा था अपनी
सारी उमर तुझे दे दूंगा
इतनी दूर मगर थी मंजिल
चलते—चलते शाम हो गयी
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वह मौजे —हवादिस का थपेड़ा न रहा
कश्ती वह हुई गर्क तो बेड़ा न रहा
सारे झगड़े थे जिंदगानी के अनीस'
जब हम न रहे तो कुछ बखेड़ा न रहा
अलम्। हरि ओम तत्सत्।

 आज इतना ही।

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अष्‍टावक्र: महागीता--(भाग--6) प्रवचन--13

चाहे बरसे जेठ अंगारे
      या पतझर हर फूल उतारे
      अगर हवा में प्यार घुला है
      हर मौसम सुख का मौसम है

जिसके पास शब्द हैं जितने
उतना उससे अर्थ दूर है
पट घूंघट का नहींरूप तो
आत्मा का जलता कपूर है

दुनिया क्या है एक वहम है
शबनम में मोती होने का
और जिंदगानी है जैसे
पीतल पर पानी सोने का

किंतु प्यार यदि साथ सफर में
तो सचमुच इस मृत्यु—नगर में
शाम सुबह की एक कसम है
मरण मद्य का नया जनम है

चाहे बरसे जेठ अंगारे
या पतझर हर फूल उतारे
अगर हवा में प्यार घुला है
हर मौसम सुख का मौसम है
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नाशाद किसे कहते हैं और शाद किसे
मजबूर किसे कहते हैं आजाद किसे
एक दिल है कि सौ भेष बदलता है 'फिराक'
बरबाद किसे कहते हैं आबाद किसे
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हिर्स और हवसे—हयाते—फानी न गयी
इस दिल से हवाए—कामरानी न गयी
है संगे—मजार पर तिरा नाम रवी
मरकर भी उमीद—ए—जिदगानी न गयी
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रक्खा है किसी की आस रहने ही में क्या
रक्खा है किसी के पास रहने ही में क्या
आदत—सी पड़ गयी है शायद वरना
रक्खा है 'फिराकउदास रहने ही में क्या
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सोचता हूं जब कभी संसार यह आया कहां से
चकित मेरी बुद्धि कुछ भी न कह पाती
और तब कहता हृदय अनुमान तो होता यही है
घट अगर है तो कहीं घटकार भी होगा
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अफसोस हमारी उम्र रोते गुजरी
नित दिल से गुबारे—गम ही धोते गुजरी
देखा न कभी ख्वाब में अपना यूसुफ
हर चंद तमाम उम्र सोते गुजरी
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टेर रही प्रिया—
तुम कहां?
किसकी यह छाह
और किसके ये गीत रे
सिहर रहा जिया—
तुम कहां?
किसके ये कांटे हैं
किसके ये पात रे
बिहर रहा हिया—
तुम कहा गुम
बिरम गये पिया
तुम कहां?
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तेरे जमाल की तस्वीर खींच दूं लेकिन
जबां में आंख नहीं आंख मे जबाँ नहीं
होता है राजे—इश्क,— ओ—मुहब्बत इन्हीं से फाश
आंखें जबां नहीं हैं मगर बेजबा नहीं
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गुलशन में फिरूं कि सैर सहरा देखूं
या मादनो —कोहो —दस्तो —दरिया देखूं
हर जी तेरी कुदरत के हैं लाखों जल्ये
हेरां हूं कि दो आंखों से क्या—क्या देखूं
जिस दिन थोड़ा अनुभव होगा उस दिन तुम पाओगेहर तरफ उसी के हजारों —हजार उत्सव हो हैं
हर जां तेरी कुदरत के हैं लाखों जल्वे
हैरां हूं कि दो आंखों से क्या—क्या देखूं
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धर लिये प्यासे अधर पर आह के सागर
प्यास पूरी इस मरुस्थल की नहीं होती
पी लिया इस उम्र ने वह प्रेम—गंगाजल
अब इसे इच्छा किसी जल कीनहीं होती
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प्यास पूरी इस मरुस्थल की नहीं होती
पी लिया इस उम्र ने वह प्रेम—गंगाजल
अब इसे इच्छा किसी जल की नहीं होती
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प्राण का यह दीप जलने के लिए है
प्यार से अंतर पिघलने के लिए है
बन अकिंचन पांवड़े पलकें बिछाए
कान अपना ध्यान आहट पर लगाए
पुलकमय हर अंग होने को समर्पण
आप मनभावन करो पावन वचन—मन
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यह किसका तबस्तुम है फिजी में साकी
यह किसकी जवानी है घटा में साकी
यह कौन बजा रहा है शीरीं बरबत
भीगी हुई बारिश की हवा में साकी
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मेरे साकी शराबे —साफी देना
हो जिससे गुनाह की तलाफी देना
उतरे न खुमार जिंदगी भर जिसका
ऐसी देना और इतनी काफी देना
मांगोप्रेम की शराब।
उतरे न खुमार जिंदगी भर जिसका
ऐसा नशा मांगो जो फिर उतरे न। चढ़े तो चढ़ेउतरे न।
ऐसी देना और इतनी काफी देना
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यारो खता मुआफ मेरी मैं नशे में हूं
सागर में मय है मय में नशा मैं नशे में हूं
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आशंका है तुम्हें
जिस दुर्घटना की
घट चुकी है वह
पहले ही भीतर
केवल आएगा तैरकर
गत आगत की सतह पर
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नीरव की अर्चा रव से
जीवन की चर्चा शव से
जैसे कोई शोरगुल से आशा कर रहा है शांति की। ऐसे कोई शव से बातें कर रहा है जीवन की। नीरव की अर्चा रव से
जीवन की चर्चा शव से
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नर! बन नारायण
स्वर! बन रामायण
और तब तुम अचानक पाओगेतुम्हारे भीतर जो तुमने नर की तरह जाना थावह नारायण है। और जो तुमने स्वर की तरह जाना थावह रामायण है।
शरीर तो मिट्टी है। मिट्टी से बना हैमिट्टी में विदा हो जाएगा।
मिट्टी नीरव
मिट्टी कलरव
मिट्टी कट भव
मिट्टी चिर नव
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तिफ्ली देखी शबाब देखा हमने
हस्ती को हवा बेआब देखा हमने
जब आंख हुई बंद तो उकदा यह खुला
जो कुछ भी देखा सो ख्वाब देखा हमने
अभी तुम जिसे जिंदगी समझ रहे हो वह सपने से ज्यादा नहीं।
जब आंख हुई बंद तो उकदा यह खुला
मरते वक्त तुम जानोगेजब आंख सच में बंद होगी तब यह राज खुलेगा—
जो कुछ भी देखा सो ख्वाब देखा हमने
जिंदगी जिसको समझते थेवह सपना सिद्ध हुई। और इस जिंदगी के भीतर जो सत्य छिपा थासपने में इतने उलझे रहे कि सत्य को कभी देखा नहीं।
कुछ पद और नसीहत ने भी तामीर न की
दुनिया के किसी काम में ताखीर न की
दिन रात यहीं के साज और सामी में रहे
जाना है कहां कुछ इसकी तदबीर न की
फिर भटकोगे। मौत से मत घबड़ाओअगर तुम्हारे जीवन में सच में ही समझने की कोई आकांक्षा है तो इतनी बात समझ लो कि यह जिसे तुम जिंदगी समझ रहे हो—
दिन रात यहीं के साज और सामी में रहे
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 जब तक कुछ अपनी कहूं सुनूं जग के मन की
तब तक ले डोली द्वार विदा— क्षण आ पहुंचा
फूटे भी तो थे बोल न स्वांस क्वांरी के
गीतों वाला इकतारा गिरकर टूट गया
हो भी न सका था परिचय दृग का दर्पण से
काजल आंसू बनकर छलका और छूट गया
इतनी जल्दी सब हो जाएगा। ज्यादा देर नहीं लगेगी।
जब तक कुछ अपनी कहूं सुनूं जग के मन की
तब तक ले डोली द्वार विदा — क्षण आ पहुंचा
कह भी न पाओगे अपने मन कीसुन भी न पाओगे अपने मन की और पाओगे कि आ गयी डोली। अर्थी उठने लगी,बंधने लगी।
फूटे भी तो थे बोल न स्वांस क्वांरी के
गीतों वाला इकतारा गिरकर टूट गया
इकतारा बज भी कहां पाता और टूट जाता है। कहां कौन कह पाता है जो कहना था! कहां कौन हो पाता है जो होना था!
हो भी न सका था परिचय दृग का दर्पण से
आंख अभी दर्पण से मिल भी न पायी थी
काजल आंसू बनकर छलका और छूट गया
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आगे पीछे एक दिवस
आना ही होगा तेरे द्वारे
इसीलिए जीवन भर मैंने
नहीं गेह पर दिये किवाडे
लेकर कोई कर्ज सीस
तेरे गोकुल जाना न उचित था
यही सोच सौ—सौ हाथों से
बांटे जग को चांद—सितारे
लेकिन इस संन्यासीपन का
फल यह सिर्फ मिला दुनिया से
आंसू तक सब रेहन हो गये
अर्थी तक नीलाम हो गयी
मैंने तो सोचा था अपनी
सारी उमर तुझे दे दूंगा
इतनी दूर मगर थी मंजिल
चलते —चलते शाम हो गयी
यहां तो सब लुट जाएगा।

आंसू तक सब रेहन हो गये
अर्थी तक नीलाम हो गयी

 यहां तो सब चुक जाएगा। यहां तो सब छूट जाएगा।
अर्थी तक नीलाम हो गयी

 यहां तो कुछ बचेगा नहीं। इसलिए मैं तुम्हें सांत्वना नहीं देता। मैं तुम्हें झकझोरना चाहता हूं। मैं तो तुम्हारी सांत्वनाएं छीन लेना चाहता हूं। मैं तो तुमसे कहता हूं, मौत निश्चित है। मौत होनेवाली है। मौत कल होगी। आने वाले क्षण में हो सकती है। बचो मतस्वीकार करो। और जितनी देर क्षण बचे हैंइनको तुम जीवन की तलाश में लगा दो। अंतस—जीवन की तलाश में। वहा है किरण अमृत कीशाश्वत की। और वह तुम्हारी किरण है। मिल सकतीतुम उसके मालिक हो। तुमने दावा नहीं किया है दावा करो! घोषणा करो। शरीर से अपने को थोड़ा हटाओचैतन्य में थोड़े जयों।

हरि ओंम तत्सत्।
आज इतना ही।