Friday, 2 September 2016

पद घुंघरू बांध--(प्रवचन--15)



सूत्र:

हेरी! मैं तो दरद दिवानीमेरो दरद न जाणे कोइ।
घायल की गति घायल जाणेकी जिन लाई होइ।
जौहरि की गति जौहरि जाणेकी जिन जौहर होइ।
सूली ऊपर सेज हमारीसोवण किस विधि होइ।
गगन मंडल पे सेज पिया कीकिस विधि मिलना होइ।
दरद की मारी बन बन डोलूंबैद मिल्या नहिं कोइ।
मीरा के प्रभु पीर मिटेगीजब बैद सांवलिया होइ।

बंसीवारा आज्यो म्हारो देसथांरी सांवरी सूरत बाला भेस।
आऊं—आऊं कर गया सांवराकर गया कौल अनेक।
गिणता—गिणता घस गई जीम्हारी आंगलिया की रेख।
मैं बैरागण आदि की जीथारि म्हारि कदको सनेस।
बिन पाणी बिन सावण सांवराहो गई धोए सफेद।
जोगण होकर जंगल हेरूंतेरो नाम न पायो भेस।
तेरी सूरत के कारण मैं तोधारया छे भगवा भेस।
मोरमुकुट पीतांबर सोहेघूंघरवाला केस।
मीरा के प्रभु गिरधर नागरमिल्यां मिटेगा क्लेस।
बाला मैं बैरागण हूंगी।
जिन भेषां म्हारो साहब रीझैसो ही भेष धरूंगी।
शील संतोष धरूं घट भीतरसमता पकड़ रहूंगी।
जाको नाम निरंजन कहिएताको ध्यान धरूंगी।
गुरु के ज्ञान रंग तन कपड़ामन मुद्रा पैरूंगी।
प्रेम प्रीत सूं हरिगुण गाऊं चरणन लिपट रहूंगी।
या तन की मैं करूं कींगरीरसना नाम कहूंगी।
मीरा के प्रभु गिरधर नागरसाधा संग रहूंगी।

हेरी! मैं तो दरद दिवानीमेरो दरद न जाणे कोइ।
घायल की गति घायल जाणेकी जिन लाई होइ।
जौहरि की गति जौहरि जाणेकी जिन जौहर होइ।
हेरी! मैं तो दरद दिवानीमेरो दरद न जाणे कोइ।
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सिसकता हुआ मन अभी चुप हुआ है
जरा ठहरोअभी मत रुलाओ
लगी चोट जब से तभी से रुदन है
बहुत ही कसक है बहुत ही जलन है
न आंसू थमे हैं नहीं दर्द कम है
भरेगा नहीं कि यह ऐसा जखम है
गए चोट करके पुनः लौट आए
कि कितने निठुर हो तुम्हें क्या बताएं
अभी घाव गीला है पीड़ा बहुत है
इसे फिर न छू लो न फिर से दुखाओ।
बहुत नींद तेरी झुकी पर न पलकें
गई भाल पर छा परेशान अलकें
कि बेचैन करवट शिकन हर चिढ़ाती
कि घायल की पीड़ा रही है बढ़ाती
कि पल भर हुआ है अभी पीर चुप है
सपन देखता प्राण का कीर चुप है
कि आंखें रुआंसी अभी ही लगी हैं
सपन यह न टूटे अभी मत जगाओ।
शलभ की लगन है जला दीप आया
मचल ज्वाल चूमी अधर को जलाया
कि बलिदान पर भी मिटी है न दूरी
अभी अर्चना है हृदय की अधूरी
गड़ी फांस मन में कि सोने न देगी
अभी पंख झुलसे सभी तन न झुलसा
निठुर दीप तुम यह अभी मत बुझाओ
सिसकता हुआ मन अभी चुप हुआ है।
जरा ठहरोअभी मत रुलाओ।

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जीवन की गलियों में
हम तो चुपचाप रहे।
मिलन बहुत प्यारा है
विरह बहुत खारा है
जीवन की प्याली में
दोनों ही साथ रहे
जीवन की गलियों में
हम तो चुपचाप रहे।
आंसू में थिरकन है
आहों में कंपन है
जीवन की लहरों पर
आशा की नाव बहे
जीवन की गलियों में
हम तो चुपचाप रहे।
लिखना मजबूरी है
खुद से भी दूरी है
अब तक तो गीतों ने
मन के ही दर्द कहे
जीवन की गलियों में
हम तो चुपचाप रहे।
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आऊं—आऊं कर गया सांवराकर गया कौल अनेक।
जब भी आशा—लहरों के हाथों नैया सौंपी
तूफानों से मिल तट ने सपने नीलाम किए
जानी—अनजानी भूलों का कर्ज चुकाने में।
सौंधी माटी जैसी सुघर उमरिया बीत चली
संबंधों के चौराहे पर किरण अकेली है
सुबह—सुबह पनघट पर नवल गगरिया रीत चली
किसने चाहा नहीं अमा के द्वार दिवाली हो
किंतु तिमिर की गलियों में दीपक बदनाम हुए
अश्रु—धरा पर गीतों के बिरवों को प्राण मिले
अनबोली अभिशप्त विवशता डाल—डाल फूली
ढलते वैरागी दिन जैसी प्रीत बावरी है
मेरी ही परछाई मुझको अनायास भूली
ठिठक गए विश्वासों के पग सर्पीले पथ पर
अनब्याही अल्हड़ निष्ठा कब तक निष्काम जिए
तन की अंजुरी में मन पारे जैसा बिखर गया
चपला की चितवन सुरधनु को बांध नहीं पाई
तरुछाया को मीत मान कर जीना मुश्किल है 
बिना प्यार की छांव जिंदगी कभी न मुस्काई।
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ये तुझसे किसने कहा गम से दिल तबाह नहीं
ये और बात कि मेरे लबों पे आह नहीं
वो एक मैं कि सरापा सवाल हूं कब से
वो एक तू कि तुझे फुरसते निगाह नहीं
ये तुझसे किसने कहा कि गम से दिल तबाह नहीं?
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जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह पद्य है और तुम्हारे भीतर प्रार्थना बन सकता है। थोड़ी राह दो। थोडा मार्ग दो। तुम्हारे हृदय की भूमि में यह बीज पड़ जाये तो इसमें फूल निश्चित ही खिलने वाले हैं। यह पद्य ऊपर से प्रगट न हो, लेकिन यह पद्य तुम्हारे भीतर प्रगट होगा। और निश्चित ही जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह मौन से आ रहा है। मौन से ही कहना चाहता हूं, लेकिन तुम सुनने में समर्थ नहीं हो। लेकिन जो मैं तुमसे कह रहा हूं, वह मौन के लिए है; मौन से है और मौन के लिए है। जो शब्द मैं तुमसे कहता हूं वह मेरे शून्य से आ रहा है, शून्य से सरोबोर है। तुम जरा उसे चबाना। तुम उसे जरा चूसना। तुम जरा उसे पचाना। और तुम पाओगे. शब्द तो खो गया, शून्य रह गया। ओशो

पद घुंघरू बांध--(प्रवचन--14)



लजते जीस्त को हम सोजे जिगर कहते हैं
राहले कल्ब को हम दीदए तर कहते हैं
तेरी ही यादे मुसलसल की हलावत है जिसे
अहले दिल मसलहतन दर्दे जिगर कहते हैं
दर्द बढ़ने से जो मिलती है हमें इक तसकीन
हम उसे अपनी दुआओं का असर कहते हैं
है ये तेरा ही मुअत्तर नफसो रंगे जमाल
सहने गुलशन में जिसे हम गुलेतर कहते हैं
रात कहते हैं जिसे है तेरी फुर्कत का खयाल
वस्ल की आस को हम नूरे सहर कहते हैं
मस्ति—ओ—हाल जिसे कहते हैं दुनिया वाले
तेरे दीवाने इसे तेरी नजर कहते हैं
एक ही बात है जलवा कहीं कहते हैं इसे
कहीं दीदार—ए—खुदी हुस्न—ए—नजर कहते हैं
तेरी रफ्तार ही अपनी है सकूने कामल
वही मंजिल है जिसे शौक—ए—सफर कहते हैं
लजते जीस्त को हम सोजे जिगर कहते हैं
जीने का स्वाद प्यार के दर्द के बिना मिलता ही नहीं।
लजते जीस्त को हम सोजे जिगर कहते हैं
राहते कल्ब को हम दीदए तर कहते हैं
और दिल का आराम कहां है?
जब आंखें आंसुओं से भरी होंतब!
राहते कल्ब को हम दीदए तर कहते हैं
भीगी आंख को ही हम हृदय का विश्राम कहते हैं।
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जिंदगी राहे गम से निकल जाएगी,
तेरी दुनिया ही यक्सर बदल जाएगी।
उनके कदमों में इस बार सर तो झुका,
उनकी चश्मे करम फिर मचल जाएगी।
दिल को मिल जाएगा तेरे अमनो सकूं
वक्त रुक जाएगा जां सम्हल जाएगी।
तेरे सर पर है जो आज मुश्किल खड़ी।
तू यकीं रख कि कल तक वो टल जाएगी।
चांदनी में धुली रात भी आएगी।
धूप रंजो अलम की भी ढल जाएगी।
तेरी रग—रग में दौड़ेगी सच्ची खुशी।
झूठी ख्वाहिश इक दिन दिल की जल जाएगी।
जिंदगी राहे गम से निकल जाएगी।
तेरी दुनिया ही यक्सर बदल जाएगी।
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रख केदेख—भाल के फरेबे जीस्त खाए जा
समझ केजान—बूझ के जहां से जी लगाए जा
यहां बनी है जो भी शै बिगड़ने को ही बनी है
ये देख के भी खूबतर हर इक शै बनाए जा
नहीं बना कोई कभी किसी का इस जहान में
ये जानते हुए भी सबको अपना तू बनाए जा
बुझे—बुझे हैं दिल यहां—दिमाग हैं धुआं—धुआं
तू इन स्याहियों में दीप प्रेम के जलाए जा
इक और हां इक और जाम की तलब है सबको यां
जो तश्नगी को दे मिटा वो जाम तू पिलाए जा
न सोच ये कि तेरी बात पा भी जाएगा कोई
है बात काम की अगर तू गलगला मचाए जा
यही सदा उठेगी नारा बन के कायनात में
कोई सुने नहीं सुने सदा—ए—हक लगाए जा

न सोच ये कि तेरी बात पा भी जाएगा कोई
है बात काम की अगर तू गलगला मचाए जा।

यही सदा उठेगी नारा बन के कायनात में
कोई सुने नहीं सुने सदाए हक लगाए जा
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जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह पद्य है और तुम्हारे भीतर प्रार्थना बन सकता है। थोड़ी राह दो। थोडा मार्ग दो। तुम्हारे हृदय की भूमि में यह बीज पड़ जाये तो इसमें फूल निश्चित ही खिलने वाले हैं। यह पद्य ऊपर से प्रगट न हो, लेकिन यह पद्य तुम्हारे भीतर प्रगट होगा। और निश्चित ही जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह मौन से आ रहा है। मौन से ही कहना चाहता हूं, लेकिन तुम सुनने में समर्थ नहीं हो। लेकिन जो मैं तुमसे कह रहा हूं, वह मौन के लिए है; मौन से है और मौन के लिए है। जो शब्द मैं तुमसे कहता हूं वह मेरे शून्य से आ रहा है, शून्य से सरोबोर है। तुम जरा उसे चबाना। तुम उसे जरा चूसना। तुम जरा उसे पचाना। और तुम पाओगे. शब्द तो खो गया, शून्य रह गया। ओशो

पद घुंघरू बांध--(प्रवचन--13)




मीरा से पुकारना सीखो
सूत्र:

सखीमेरी नींद नसानी हो।
पिय को पंथ निहारत सिगरीरैन विहानी हो।
सब सखियन मिलि सीख दईमन एक न मानी हो।
बिन देख्या कल नांहि पड़तजिय ऐसी ठानी हो।
अंगिअंगि व्याकुल भईमुख पिय—पिय बानी हो।
अंतर वेदन विरह कीवह पीड़ न जानी हो।
ज्यूं चातक घन कूं रटैमछरी जिमि पानी हो।
मीरा व्याकुल विरहिणीसुध—बुध बिसरानी हो।


डारि गयो मनमोहन फांसी।
अम्बुआ की डाली कोयल इक बोलैमेरो मरण अरू जग केरी हांसी।
विरह की मारी मैं बन—बन डोलूंप्राण तजूं करवत ल्यूं कासी।
मीरा के प्रभु हरि अविनासीतुम मेरे ठाकुर मैं तेरी दासी।

प्यारे दरसन दीजो आएतुम बिन रह्यो न जाए।
जल बिन कमल चंद बिन रजनीऐसे तुम देख्या बिन सजनी।
व्याकुल व्याकुल फिरूं रैण दिनबिरह कलेजो खाए।
दिवस न भूख नींद नहिं रैणामुखसूं कथत न आवै वैणा।
कहा कहूं कछु कहत न आवैमिल कर तपत बुझाए।
क्यूं तरसाओ अंतरजामीआए मिलो किरपा कर स्वामी।
मीरा दासी जनम—जनम कीपड़ी तुम्हारे पांए।
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तू ऐसे सरखुशो सरमस्त मयकदे में आ
कि मुस्कुरा के तुझे हर नजर सलाम करे।
फिर ऐसी पी कि हो सदनाज तुझ पे साकी वो
वो फख्र मय को—तेरा एहतराम जाम करे।
खुशी से झूम उठे मयकदा जो पीरे मुगां।
नजर मिला के तेरा साथ फिर कलाम करे।
हयात रक्स करे नगमे रूह से उठें।
जो रक्से बादाकशी मयफरोश आम करे।
पिला के डाले जो रिंदों पे एक निगाहे गलत।
तमाम इशरतो ऐशे जहां हराम करे।  
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जो राहते जां है वो अलम मुझको मिला है
जो ऐने मुसर्रत है वो गम मुझको मिला है।
जिस गम से जहांगीर मोहब्बत हुई है पैदा
है हासिले कौनेन जो गम मुझको मिला है।
जिस साज के तारों से हुई राग की तखलीक
सद शुक्र कि वो साजे अलम मुझको मिला है।
सर चश्माए इल्ताको इनायातो नवाजिश
जो जाने करम है वो सितम मुझको मिला है।
जिस कुफ्र से ईमान की होती है इबारत
जो अस्ले यकीं है वो भरम मुझको मिला है।
पलते हैं जबीं में मेरे अब सैकड़ों सूरज
जब से तेरा ये नक्शे कदम मुझको मिला है।
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है दिल को क्यों करार मुझे कुछ पता नहीं
आंखें हैं अश्कबार मुझे कुछ पता नहीं
रौशन हुए हैं महर सिफ्त दागहाए दिल
है कौन शोलाबार मुझे कुछ पता नहीं
धड़कन इक एक दिल की है आवाजे पाए दोस्त
क्या है यही करारमुझे कुछ पता नहीं।
एहसासे कुरबे दोस्त है एहसास बेखुदी
क्या है विसाले यारमुझे कुछ पता नहीं
साकी की चश्मे मस्त है और मेरी तश्नगी
हैं और मय गुसारमुझे कुछ पता नहीं
नकहत है ताजगी है मुसर्रत है दमबदम
होगी यही बहारमुझे कुछ पता नहीं
क्या कर गई है एक नजर में निगाहे मस्त
है कोई होशियारमुझे कुछ पता नहीं।
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मोअज्जन कुलजमे पाकीजगी है दिल में मेरे
मैं बजाहिर तो गुनाहगार नजर आता हूं
नकहतो रंगे गुलिस्ता हैं रगो में मेरी
एक सूखा हुआ गो खार नजर आता हूं।

एक सरमस्तिए जावेद मुझे है हासिल
देखने को तो मैं हुशियार नजर आता हूं।

जिंदगी में मेरी कोनैन की वुसअत शामिल
बंदे हस्ती में गिरफ्तार नजर आता हूं।

रौनक अफरोज इक सुबहे दरक्शां मुझमें
गरचे महबूस शबे तार नजर आता हूं।

मुझसे बाबस्ता है सब कुवते तखलीके हयात
लागरो बेकसो लाचार नजर आता हूं।

लागरो बेकसो लाचार नजर आता हूं।
मेरी हस्ती में है तनवीरे जहां पोशीदा
पाबगिल सायाए दीवार नजर आता हूं।

इंबसात और मुसर्रत का हूं मैं सर चश्मा
गमे हस्ती का लिए बार नजर आता हूं।
और भीतर तो हर्ष ही हर्ष है।
इंबसात और मुसर्रत का हूं मैं सर चश्मा।

गमे हस्ती का लिए बार नजर आता हूं।
मिट चुका है मेरा एहसासे अना लेकिन मैं
मए पिंदार से सरशार नजर आता हूं।
हर तआल्लुक से है आजाद तबीयत मेरी
दामे दुनिया में गिरफ्तार नजर आता हूं।
मस्तो सरशार हूं हर वक्त खयाले हक में
काफिरो आसीओ मयखार नजर आता हूं।
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मीरा से पुकारना सीखो।

आज इतना ही।
जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह पद्य है और तुम्हारे भीतर प्रार्थना बन सकता है। थोड़ी राह दो। थोडा मार्ग दो। तुम्हारे हृदय की भूमि में यह बीज पड़ जाये तो इसमें फूल निश्चित ही खिलने वाले हैं। यह पद्य ऊपर से प्रगट न हो, लेकिन यह पद्य तुम्हारे भीतर प्रगट होगा। और निश्चित ही जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह मौन से आ रहा है। मौन से ही कहना चाहता हूं, लेकिन तुम सुनने में समर्थ नहीं हो। लेकिन जो मैं तुमसे कह रहा हूं, वह मौन के लिए है; मौन से है और मौन के लिए है। जो शब्द मैं तुमसे कहता हूं वह मेरे शून्य से आ रहा है, शून्य से सरोबोर है। तुम जरा उसे चबाना। तुम उसे जरा चूसना। तुम जरा उसे पचाना। और तुम पाओगे. शब्द तो खो गया, शून्य रह गया। ओशो

पद घुंघरू बांध--(प्रवचन--12)



पद घुंघरू बांध--(प्रवचन--12)


गरज नहीं मुझे इससे कि सरवरी क्या है
मैं जानता हूं मगर शाने बंदगी क्या है
बुलंदियों को जो अर्शे बरीं की छू न सके
वो मौजे खाके फकीरी व आजिजी क्या है
खुदा है जिसके लिए बेकरार वो सजदा
जबीं में जिसकी न तड़पे वो आदमी क्या है
विसालो हिज्र की जो कैद से न हो आजाद
वो दोस्ती वो मोहब्बत वो आशकी क्या है
खयाले यार में खुद से भी वो रहे आगाह
वो जां सपुर्दगी क्या है वो बेदिली क्या है
जो इरतकाये खुदी से खुदा तक आ न गया
फरिश्ता रह गया बन कर वो आदमी क्या है
न बेखुदी को समोये जो अपने दामन में
जो राजे मर्ग न पा जाए वो खुदी क्या है
रहे जो दायराये हुसनों इश्क में महदूद
जो अपना आप न पाए वो आग ही क्या है,
जो शोरे जीस्त को अपने में जज्ब कर न सके
न जिसमें उठें तराने वो खामशी क्या है
नफस नफस में न जिसके बहारे ताजा हो
जो रंगो बू न बखेरे वो जिंदगी क्या है
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जनूने आगही हूं शोरसे हको सदाकत हूं
मैं इरफाने मोहब्बत हूंमैं तूफाने मुसर्रत हूं
सदा जो कामयाबों कामरा हो मैं वो लज्जत हूं
न हो जो आशनाये रन्जो कुल्फत मैं वो राहत हूं
वकूरे जल्वा मुझसे इश्क की सरमस्तियां मुझसे।
निशाने वस्ले पैहम हूं इलाजे दर्दे फुर्कत हूं
गुलिस्ताने जहां है मेरे दम से खुल्दे नज्जारा
गुलों की ताजगी हूं मैं हजूमे रंगो नहकत हूं
सितारों की चमक हूं रोशनी हूं चांद—सूरज की
फिजां की वसहतें बेइंतहा गरदूं की रिफअत हूं
मेरे नक्शे कदम से कहकशां का नूर है पैदा
समाए जिसमें हैं कौनेन वो दामाने वुसअत हूं
फना कर दे अदावत को मिटा डाले जो नफरत को
वो बर्के इश्क हूं वो शोलाए सोजे मोहब्बत हूं।
नहीं कुछ इम्तियाजे कुफ्रो ईमां ताअतो इसियां
खुला सबके लिए हो जिसका दामन वो सखावत हूं
जहां की पस्तियों में मौजे रिफअत मुझसे उठती है
गुनाह की वादियों में आबशारे अक्रूओ रहमत हूं।
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जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह पद्य है और तुम्हारे भीतर प्रार्थना बन सकता है। थोड़ी राह दो। थोडा मार्ग दो। तुम्हारे हृदय की भूमि में यह बीज पड़ जाये तो इसमें फूल निश्चित ही खिलने वाले हैं। यह पद्य ऊपर से प्रगट न हो, लेकिन यह पद्य तुम्हारे भीतर प्रगट होगा। और निश्चित ही जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह मौन से आ रहा है। मौन से ही कहना चाहता हूं, लेकिन तुम सुनने में समर्थ नहीं हो। लेकिन जो मैं तुमसे कह रहा हूं, वह मौन के लिए है; मौन से है और मौन के लिए है। जो शब्द मैं तुमसे कहता हूं वह मेरे शून्य से आ रहा है, शून्य से सरोबोर है। तुम जरा उसे चबाना। तुम उसे जरा चूसना। तुम जरा उसे पचाना। और तुम पाओगे. शब्द तो खो गया, शून्य रह गया। ओशो

पद घुंघरू बांध--(प्रवचन--11)

जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह पद्य है और तुम्हारे भीतर प्रार्थना बन सकता है। थोड़ी राह दो। थोडा मार्ग दो। तुम्हारे हृदय की भूमि में यह बीज पड़ जाये तो इसमें फूल निश्चित ही खिलने वाले हैं। यह पद्य ऊपर से प्रगट न हो, लेकिन यह पद्य तुम्हारे भीतर प्रगट होगा। और निश्चित ही जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह मौन से आ रहा है। मौन से ही कहना चाहता हूं, लेकिन तुम सुनने में समर्थ नहीं हो। लेकिन जो मैं तुमसे कह रहा हूं, वह मौन के लिए है; मौन से है और मौन के लिए है। जो शब्द मैं तुमसे कहता हूं वह मेरे शून्य से आ रहा है, शून्य से सरोबोर है। तुम जरा उसे चबाना। तुम उसे जरा चूसना। तुम जरा उसे पचाना। और तुम पाओगे. शब्द तो खो गया, शून्य रह गया। ओशो

            पद घुंघरू बांध--(प्रवचन--11)



म्हारो जनम—मरन को साथीथानें नहिं बिसरूं दिन—राती।
तुम देख्यां बिन कल न पड़त हैजानत मेरी छाती।
ऊंची चढ़—चढ़ पंथ निहारूंरोवै अखियां राती।
यो संसार सकल जग झूंठोझूंठा कुल रा न्याती।
दोउ कर जोड़यां अरज करत हूं सुण लीजो मेरी बाती।
यो मन मेरो बड़ो हरामीज्यूं मदमातो हाथी।
सतगुरु हस्त धरयो सिर ऊपरअंकुस दे समझाती।
पल—पल तेरा रूप निहारूंहरि चरणां चित राती।


मोहे लागी लगन गुरु चरनन की।
चरण बिना कछुवै नहिं भावैजग माया सब सपनन की।
भवसागर सब सूखि गयो हैफिकर नहीं मोहे तरनन की।
मीरा के प्रभु गिरधर नागरआस वही गुरु सरनन की।

होरी खेलत हैं गिरधारी।
मुरली चंग बजत डफ न्यारोसंग जुवति व्रजनारी।
चंदन केसर छिड़कत मोहनअपने हाथ बिहारी।
भरि—भरि मूठि गुलाल लाल चहुं देत सवन पै डारी।
छैल—छबीले नवल कान्हसंग स्यामा प्राण प्यारी।
गावत चार धमार राग तंह दै दै कल करतारी।
फागु जु खेलत रसिक सांवरोबाढ़यो ब्रज रस भारी।
मीरा के प्रभु गिरधर नागरमोहन लाल बिहारी।
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हांछलकती हुई शराब आए
जोश में फिर मेरा शबाब आए
फिर थिरकते हुए उठें नगमे
हाथ में इश्क का रुबाब आए
हर तरफ से निगाहे शौक को आज
इक शगुफ्ता हसीं जवाब आए
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जिस दिल की हर तड़प थी नई जिंदगी मुझे
जां बख्शो जां नवाज वो अब दिल नहीं रहा
है दर्द अब भी दर्द मगर वो कसक नहीं
अपना वो अब जिगर नहीं वो दिल नहीं रहा
है बर्क अब भी दुश्मने खिर्मन मगर मुझे
जाने न क्यों कोई गमे हासिल नहीं रहा।
जब से हुआ हूं खाके कफे पाए दोस्त में
मुझको खयाले जादाओ मंजिल नहीं रहा।
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जिस दिल की हर तड़प थी नई जिंदगी मुझे
जां बख्शो जां नवाज वो अब दिल नहीं रहा
है दर्द अब भी दर्द मगर वो कसक नहीं
अपना वो अब जिगर नहीं वो दिल नहीं रहा
है बर्क अब भी दुश्मने खिर्मन मगर मुझे
जाने न क्यों कोई गमे हासिल नहीं रहा।
जब से हुआ हूं खाके कफे पाए दोस्त में
मुझको खयाले जादाओ मंजिल नहीं रहा।