Friday, 19 August 2016

पद घूंघरू बांध--(प्रवचन--04)

जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह पद्य है और तुम्हारे भीतर प्रार्थना बन सकता है। थोड़ी राह दो। थोडा मार्ग दो। तुम्हारे हृदय की भूमि में यह बीज पड़ जाये तो इसमें फूल निश्चित ही खिलने वाले हैं। यह पद्य ऊपर से प्रगट न हो, लेकिन यह पद्य तुम्हारे भीतर प्रगट होगा। और निश्चित ही जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह मौन से आ रहा है। मौन से ही कहना चाहता हूं, लेकिन तुम सुनने में समर्थ नहीं हो। लेकिन जो मैं तुमसे कह रहा हूं, वह मौन के लिए है; मौन से है और मौन के लिए है। जो शब्द मैं तुमसे कहता हूं वह मेरे शून्य से आ रहा है, शून्य से सरोबोर है। तुम जरा उसे चबाना। तुम उसे जरा चूसना। तुम जरा उसे पचाना। और तुम पाओगे. शब्द तो खो गया, शून्य रह गया। ओशो

पद घूंघरू बांध--(प्रवचन--04)


वही तो है जिंदगी कि जिसमें अटूट अहसास हो बका का,
है मौत का जिसमें खौफहरदम वह जिंदगी जिंदगी नहीं है।
वही तो है रौशनी हो जिससे दिलो दिमागे बेशर दरकशां
करे जो दीवारो दर को रौशन वह रौशनीरौशनी नहीं है।
वही तो है ताजगी जो दौड़े रगों में मौजे निशात बन कर,
जो आरजो लब को रंग दे बसवो ताजगी ताजगी नहीं है।
वही तो है कैफे हस्त जिसमें पता न हो कैफे हस्त का भी,
है जिसमें एहसास बेखुदी का वो बेखुदी बेखुदी नहीं है।
वही तो है आशकी सरूरे निशाते रहती हो जिसमें हरदम,
हो गम का एहसास जिसमें पैदा वह आशकी आशकी नहीं है।
वही तो है खुद सपुर्दगीजिसमें हे शऊरे खुदी का फना सब,
खयाल अपना हो जिसमें बाकी वो बेदिली बेदिली नहीं है।
वही तो है बंदगी फक्त जो तेरी खुशी के लिए अदा हो,
तलब कि जिसमें हो लाग कुछ भी वो बंदगी बंदगी नहीं है।
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सितारों के जहां तक आ गए हैं
गुबारे कारवां तक आ गए हैं
तलाशे आस्ताने यार में हम
जमीं से आस्मां तक आ गए हैं,
मकान अपना मुअय्यन है न मंजिल,
कहें क्या हम कहां तक आ गए हैं,
फलक की वुसअतों से गुजर कर,
हदूदे ला-मकां तक आ गए हैं,
ये माना हमने वाइज और मोमन
सभी बागे जनां तक आ गए हैं,
मगर ऐसे भी हैं गुमगश्ता कुछ लोग,
जो रब्बे दो जहां तक आ गए हैं
ये माना हमने वाइज और मोमन
सभी बागे जनां तक आ गए हैं।
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ये जामो सबू दे उठा मेरे साकी,
अब आंखों से अपनी पिला मेरे साकी,
पिलाता चला जाजो पीना खता है,
तो होती रहे यह खता मेरे साकी,
मेरी तश्नगी फैज तक तेरे पहुंचे,
बढ़ा और उसको बढ़ा मेरे साकी,
बकाए हयाते खिरद से बचा ले,
मुझे बख्श कैफै फना मेरे साकी,
यही आरजू खत्मे सद आरजू है,
मुझे ऐसा बेखुद बना मेरे साकी,
यही मेरी मंजिल यही मेरा हासिल,
तू कदमों में दे दे मुझको जां मेरे साकी।
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मेरी आंखों ने जो देखा हैदिखलाया नहीं जाता
मेरे दिल ने जो समझा है वो समझाया नहीं जाता
मेरे सर में अजल से गूंजता है राग वहदत का
मगर कुछ बात है ऐसीअभी गाया नहीं जाता
मेरी आंखों में है जल्वा तेरादिल में तेरा मसकन
मगर मुश्किल तो ये हैफिर भी तू पाया नहीं जाता
है तेरे हुस्ने आलम ताब से मुझको शिकायत तो
मगर हरफे शिकायत लब पे भी लाया नहीं जाता
तेरे दम से हुई कायम शबाबो शेर की दुनिया
शबाबो शेर में लेकिन तुझे पाया नहीं जाता।

पद घूंघरू बांध--(प्रवचन--03

जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह पद्य है और तुम्हारे भीतर प्रार्थना बन सकता है। थोड़ी राह दो। थोडा मार्ग दो। तुम्हारे हृदय की भूमि में यह बीज पड़ जाये तो इसमें फूल निश्चित ही खिलने वाले हैं। यह पद्य ऊपर से प्रगट न हो, लेकिन यह पद्य तुम्हारे भीतर प्रगट होगा। और निश्चित ही जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह मौन से आ रहा है। मौन से ही कहना चाहता हूं, लेकिन तुम सुनने में समर्थ नहीं हो। लेकिन जो मैं तुमसे कह रहा हूं, वह मौन के लिए है; मौन से है और मौन के लिए है। जो शब्द मैं तुमसे कहता हूं वह मेरे शून्य से आ रहा है, शून्य से सरोबोर है। तुम जरा उसे चबाना। तुम उसे जरा चूसना। तुम जरा उसे पचाना। और तुम पाओगे. शब्द तो खो गया, शून्य रह गया। ओशो

पद घूंघरू बांध--(प्रवचन--03)

मैं तो गिरधर के घर जाऊं।
गिरधर म्हारो सांचो प्रीतम देखत रूप लुभाऊं।
रैन पड़ै तब ही उठि जाऊं भोर भये उठि आऊं।
रैन-दिना बाके संग खेलूं ज्यूं त्यूं वाहि रिझाऊं।
जो पहिरावै सोई पहरूंजो दे सोई खाऊं।
मेरी उनकी प्रीत पुराणीउन बिन पल न रहाऊं।
जहां बैठावे तित ही बैठूंबेचैं तो बिक जाऊं।
मीरा के प्रभु गिरधर नागरबार-बार बलि जाऊं।


मीरा मगन भई हरि के गुण गाए।
सांप पिटारा राणा भेज्योमीरा हाथ दियो जाए।
न्हाय-धोए जब देखन लागी सालिगराम गई पाए।
जहर का प्याला राणा भेज्योअमृत दीन्ह बनाए।
न्हाय-धोए जब पीवन लागीहो अमर अंचाए।
सूल सेज राणा ने भेजीदीज्यो मीरा सुलाए।
सांझ भई मीरा सोवण लागीमानो फूल बिछाए।
मीरा के प्रभु सदा सहाईराखे बिघन घटाए।
भजन भाव में मस्त डोलतीगिरधर पै बलि जाए
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जैसे हवा में अपने को खोल दिया है इन फूलों ने
आकाश और किरणों और झोंकों को सौंप दिया है अपना रूप
और उन्होंने जैसे अपने में भर कर भी उन्हें छुआ नहीं है
ऐसा नहीं हो सकता क्या तुमसे मेरे प्रति?
नहीं हो सकता शायदऔर इसी का रोना है
या ऐसा भी किसी दिन होना है?
तुम्हारे वातावरण में डाल दी है कितनी बार मैंने अपनी आत्मा
तुमने उसे या तो अपने अंक में ही नहीं लिया
या फिर इतना अधिक खींच लिया हैजितना तुम्हें न पा सकने पर
मैंने जीवन को छाती पर भींच लिया है
क्यों नहीं रह सकते हम परस्पर फूल और आकाश की तरह?
यह नहीं हो सकता शायद और इसी का रोना है
या ऐसा भी किसी दिन होना है?
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तू मुझे बता कि क्या था तू मेरे बयां से पहले,
तेरी थी तो क्या हकीकत थी मेरे गुमां से पहले,
मिला राजे लामकां भी तो मकां की ही आगही से,
न शऊरे लामकां था कहीं भी मकां से पहले,
इसे मैंने ही बसाया इसे मैंने ही सजाया,
यह चमन चमन नहीं था तेरा बागवां से पहले,
न पता था बिजलियों को कोई अपनी मंजिलों का,
यूं ही बस भटक रही थीं मेरे आशियां से पहले,
तेरे जोहए लनतरानी को अयां किया था मैंने,
तेरा जल्वा कब था जल्वा मेरे इम्तहां से पहले,
हुआ है दर्दे दिल से पैदा ये तसब्बरे मुसर्रत,
ये निशाते जहां कहां थीं गमें जावदां से पहले,
न फुगाने नीम शब थी न दुआए सुबहगाही,
तेरा जिक्र तक नहीं था मेरी दास्तां से पहले।
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न फुगाने नीम शब थी...
न तो संध्या को मंदिरों की घंटियां बजती थीं और संध्या की प्रार्थना या नमाज होती थी।
...न दुआए सुबहगाही
और न सुबह की कोई प्रार्थना थी।
तेरा जिक्र तक नहीं था मेरी दास्तां से पहले।
जब तक मेरी कहानी न घटी थीतब तक तेरी किसी को खबर भी न थी,तेरा जिक्र भी नहीं था।
मेरे शौक-ए-बंदगी से बने दैर-औ-हरम सब,
तेरी सजदागाह कहां थी मेरे आस्तां से पहले,
भक्त कभी-कभी जूझता है और वह कहता है कि यह मैंने ही बनाए हैं--ये मंदिर और मस्जिदये गुरुद्वारेये गिरजे।
मेरे शौक-ए-बंदगी से बने दैर-औ-हरम सब
यह मेरा ही प्रेम हैयह मेरी ही पुकार है--जिसने ये सारे मंदिर-मस्जिद बनाए हैं।
तेरी सजदागाह कहां थी मेरे आस्तां से पहले
और जब तक मेरा माथा झुकने को नहीं थातब तक कहां थी तेरी प्रतिमा और कहां था तेरा पूजा-स्थल। कहां था तूतेरा होना मुझसे पहले नहीं हो सकता।
मेरे नक्शे पा से पैदा हुए जिंदगी के रस्ते,
मैं ही गामजन हुआ था यहां कारवां से पहले,
तेरा नाम तेरी हस्ती तेरी अस्ल तेरी सूरत,
ये तमाम लफ्जो मानी थे कहां बयां से पहले
मेरे कहने के पहले इन शब्दों में अर्थ ही क्या था!
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तू पास नहीं मेरे तो कुछ पास नहीं है,
तेरी जो नहीं आस कोई आस नहीं है,
लब पर है हंसी तेरे तो सब कुछ है मुझे रास,
रंजीदा अगर तू है तो कुछ रास नहीं है,
तेरे लिए हूं चाके गरेबां को छुपाए,
दुनिया का तो कुछ इतना मुझे पास नहीं है,
सुन लेते हो तो हो जाती है तसल्ली मेरे दिल की,
रूदादे मोहब्बत मेरी कुछ खास नहीं है,
तुमसे नहीं बाबस्ता मेरी कौन सी उम्मीद
कहने को मुझे तुमसे कोई आस नहीं है।
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राजी हो रजा पर तेरीहुए मजबूर थेहम मुख्तार बने,
ये हार हमारी हार है वोजो जीत को भी शरमाती है।
ये हार हमारी हार है वोजो जीत को भी शरमाती है,
ये नूरे जोहदो तायत हैजो बिजली बन कर गिरता है,
इसियां की काली बदली तो रहमत की घटा बन जाती है।
जो चाहे दुनिया कहने दोतुम अपना काम किए जाओ,
मय्यार जमाने के हिम्मत इंसान की आप बनाती है।
बख्शी है मुसलसल एक तड़प तो इतना एहसां और करो;
हम पर भी नजर वो हो जाए जो दोनों जहां गरमाती है।
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पीए बगैर ही रहता हूं मस्तमेरे लिए
ये जामो वादाओ पैमाना ओ सबू क्या है।
मेरी निगाह में रक्सां है मौजे हुस्ने अजल,
जमाल जोहरा जबीना की आबरू क्या है।
मेरी निगाह में रक्सां है मौजे हुस्ने अजल,
जमाल जोहरा जबीना की आबरू क्या है,
मेरे खयाल से तखलीक है बहारों की,
मैं जानता हूं ये अफ्सूं रंगो बू क्या है।
मेरे खयाल से तखलीक है बहारों की,
मैं जानता हूं ये अफ्सूं रंगो बू क्या है,
मेरे सकूत के पर्दों से राग उठते हैं
तिलस्म हुस्ने बयां सहरे गुफ्तगू क्या है
मेरे सकूत के पर्दों से राग उठते हैं!
मेरे ही शौके तमाशा का इक करश्मा है,
हजूमें जल्वाए अनवार चार-सू क्या है,
बिनाए जीस्त हूं अस्ले निशात है मुझसे,
मेरा ही खेल है तूफाने आरजू क्या है,
मेरे ही कदमों से मिलता है मंजिलों का पता,
ये देख जौके सफर शौके जुस्तजू क्या है,
मेरा मकाने फना है सकूनपर्दाए गैब,
बस इक जहूरे खुदी शौरशे नमूं क्या है,
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गरेबां चाक भी होगा फुगां तक बात आ पहुंची,
वहां तक जा ही पहुंचेगी जो यां तक बात आ पहुंची,
मिटा कर अपनी हस्ती तुझको आखिर पा ही लूंगा मैं,
जलेंगे बालो पर भी आशियां तक बात आ पहुंची,
बनाया था जलाने ही को आखिर आशियां अपना,
चमन में शुक्र है बर्केत्तपां तक बात आ पहुंची,
शरीके कारवां हूं मैं गुबारे कारवां होकर,
मेरे मिटने की मीरे कारवां तक बात आ पहुंची,
मुझे जो मुस्कुरा कर अपने हाथों जाम बख्शा था,
इनायत थी मगर अब दास्तां तक बात आ पहुंची,
चमन वालो उठो आराइशे महफिल का वक्त आया,
खिजां से अब बहारे बेखिजां तक बात आ पहुंची,
सजाएदार हो तजवीज अब मेरे लिए शायद,
जो कह बैठा हूं मैं पीरे मुगां तक बात आ पहुंची।
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पद घूंघरू बांध--(प्रवचन--02)

जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह पद्य है और तुम्हारे भीतर प्रार्थना बन सकता है। थोड़ी राह दो। थोडा मार्ग दो। तुम्हारे हृदय की भूमि में यह बीज पड़ जाये तो इसमें फूल निश्चित ही खिलने वाले हैं। यह पद्य ऊपर से प्रगट न हो, लेकिन यह पद्य तुम्हारे भीतर प्रगट होगा। और निश्चित ही जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह मौन से आ रहा है। मौन से ही कहना चाहता हूं, लेकिन तुम सुनने में समर्थ नहीं हो। लेकिन जो मैं तुमसे कह रहा हूं, वह मौन के लिए है; मौन से है और मौन के लिए है। जो शब्द मैं तुमसे कहता हूं वह मेरे शून्य से आ रहा है, शून्य से सरोबोर है। तुम जरा उसे चबाना। तुम उसे जरा चूसना। तुम जरा उसे पचाना। और तुम पाओगे. शब्द तो खो गया, शून्य रह गया। ओशो

पद घूंघरू बांध--(प्रवचन--02)

जिससे हिल जाएं अर्श के पाये
अपने उस दर्द-ओ-गम की बात करो।
जो रुला दे तमाम आलम को
बस उसी चश्मे-नम की बात करो।
क्या हकीकत गमे जहां की है
मेरे साकी के दम की बात करो
क्या हकीकत गमे जहां की है
इस दुनिया के दुखों में रखा क्या है?
मेरे साकी के दम की बात करो
है रहीमो करीम अपना खुदा
हमसे लुत्फ-ओ-करम की बात करो।
हिज्र भी है वसाल का पैगाम
ऐने राहत सितम की बात करो।
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नमूदे जिंदगी का राज क्या है
मैं खुद क्या हूंमेरी आवाज क्या है
फसूने नगमा क्या हैसाज क्या है
जनूने इश्क क्या हैनाज क्या है?
ये रंगो बू ये रैनाई ये जल्वे
ये दिलकश सूरतो अंदाज क्या है
कहां तक हुस्न की फैली है वुसअत
न जाने इश्क की परवाज क्या है?
जो आंखों में फिरे हर वक्त सूरत
जो गूंजे कान में आवाज क्या है
कहूं क्या दीदाओ दिल दोनों हैरां
ये ऐजाजे हजूमे नाज क्या है?
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कांटों पै एतबार किया है कभी-कभी
फूलों को शर्मसार किया है कभी-कभी
पैमानाए बहार किया है कभी-कभी
जल्वों को आशकार किया है कभी-कभी
रहम आ गया जो इनपै मेरे जब्ते इश्क को,
आंखों को अश्कबार किया है कभी-कभी
रस्मो रिवाजे इश्क का कायल नहीं मगर
दामन को तारत्तार किया है कभी-कभी
गो बेखबर नहीं हूं हकीकत से खार की
फूलों पै एतबार किया है कभी-कभी।
जो देवता भी पा न सके मैंने वो कदम
चूमे हैंउनसे प्यार किया है कभी-कभी
सर आस्तां पे तेरे झुकाए रहा मगर
इसको सुपुर्द-ए-दार किया है कभी-कभी
मैं हूं तो कोई दूसरा कैसे हुआ कहीं
मैं ही को "तूशुमार किया है कभी-कभी
ऐसा चलता है।
कांटों पै एतबार किया है कभी-कभी
फूलों को शर्मसार किया है कभी-कभी।
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बसाया बिजलियों में आस्मां की
इलाही खैर मेरे आशियां की
समेटा दो जहां को अपने दिल में
खबर पाई निशाने बेनिशां की
जिधर उठी निगाहें शौक अपनी
उधर आई सिमट रौनक जहां की,
जहां जोश आया एक नारा लगाया
भर आया जी तो पैहम एक फुगां की
जहां सर झुक गया सजदे हुए हैं
रही बंदिश न संगे आस्तां की
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निकल के जन्नत से आए थे हमवहां कोई हमनफस नहीं था
चले हैं दुनिया से तेरी या रब यहां कोई हमनवा नहीं है
यह सिलसिला मौत-औ-जिंदगी का तो है फरेबे निगार यकसर
न कोई आया यहां कहीं सेयहां से कोई गया नहीं है
तलाशे दरमां में मैं भटकता कहां फिरूंगा मेरे मसीहा
तेरी नजर के सिवा मेरे दर्दे दिल की कोई दवा नहीं है
तुम्हीं कहो मैं तुम्हारे दर से कहां चला जाऊं उठ के आखिर
सिवा तुम्हारे जहां में मेरा कोई भी तो आसरा नहीं है
जो तू है तो मैं नहीं हूं पैदाजो मैं हूं तो तू नहीं है जाहिर
यहां तो बस बात एक की हैयहां कोई दूसरा नहीं है
खुदा के बंदे खुदा को पाते हैं अपनी हस्ती को खुद मिटा के
खुदी की तकमील करके देखें जो कह रहे हैं खुदा नहीं है
खुदा के बंदे खुदा को पाते हैं अपनी हस्ती को खुद मिटा के!
एक ही रास्ता है उसे पाने और जानने का: अपने को मिटा देना।
खुदा के बंदे खुदा को पाते हैं अपनी हस्ती को खुद मिटा के
खुदी की तकमील करके देखें जो कह रहे हैं खुदा नहीं है।


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पद घूंघरू बांध--(प्रवचन--01)

जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह पद्य है और तुम्हारे भीतर प्रार्थना बन सकता है। थोड़ी राह दो। थोडा मार्ग दो। तुम्हारे हृदय की भूमि में यह बीज पड़ जाये तो इसमें फूल निश्चित ही खिलने वाले हैं। यह पद्य ऊपर से प्रगट न हो, लेकिन यह पद्य तुम्हारे भीतर प्रगट होगा। और निश्चित ही जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह मौन से आ रहा है। मौन से ही कहना चाहता हूं, लेकिन तुम सुनने में समर्थ नहीं हो। लेकिन जो मैं तुमसे कह रहा हूं, वह मौन के लिए है; मौन से है और मौन के लिए है। जो शब्द मैं तुमसे कहता हूं वह मेरे शून्य से आ रहा है, शून्य से सरोबोर है। तुम जरा उसे चबाना। तुम उसे जरा चूसना। तुम जरा उसे पचाना। और तुम पाओगे. शब्द तो खो गया, शून्य रह गया। ओशो

पद घूंघरू बांध--(प्रवचन--01)


बसौ मेरे नैनन में नंदलाल।
मोहनी मूरत सांवरी सूरतनैना बने बिसाल।
मोर मुकुट मकराकृति कुंडलअरुण तिलक शोभे भाल।
अधर सुधारस मुरली राजतिउर वैजंति माल।
छुद्र घंटिका कटितट सोभितनूपुर सबद रसाल।
मीरा प्रभु संतन सुखदाईभक्त बच्छल गोपाल।

हरि मोरे जीवन प्राण आधार।
और आसिरो नाहिं तुम बिनतीनूं लोक मंझार।
आप बिना मोहि कछु न सुहावैनिरखौ सब संसार।
मीरा कहै मैं दास रावरीदीज्यौ मति विसार।


मेरे तो गिरधर गोपालदूसरो न कोई।
जाके सिर मोर मुकुटमेरो पति सोई।
छाड़ि दई कुल की कानिकहा करि है कोई।
संतन ढिंग बैठि बैठि लोकलाज खोई।
अंसुवन जल सींचि सींचिप्रेम-बेलि बोई।
अब तो बेलि फैल गईआनंद फल होई।
भगत देख राजी हुईजगत देख रोई।
दासी मीरा लाल गिरधरतारो अब मोहि।
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तरानों में मोहब्बत का तराना ले के आया हूं
फसानों में हकीकत का फसाना ले के आया हूं
तलाशे बर्के आदम सोज में निकला हूं जन्नत से
जलाने ही को आखिर आशियाना ले के आया हूं
जमाने से अलग हूं अहले सोहबत के लिए लेकिन
नया हक्को अमल का इक जमाना ले के आया हूं
उठ और तय दो जहां की मंजिलें एक गाम में कर ले
जनूने अर्शो पैमां वालहाना ले के आया हूं।
उठ! जाग!
उठ और तय दो जहां की मंजिलें एक गाम में कर ले
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तू है मुहीते बेकरांमैं हूं जरा-सी आबजू
या मुझे हमकिनार कर या मुझे बेकिनार कर।
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मेरे दिल को दोस्त ने लालाजार कर दिया
ये खिजाजादा चमन पुरबहार कर दिया
देखते ही देखते बर्के शोला पाश को
इक निगाहे लुत्फ से आबशार कर दिया
अब मुझे दिया दिखा मौत से परे है क्या
जिंदगी का राज सब आशकार कर दिया
होशियार को दिया इक जनूने जावदां
मस्त उसे बनाके फिर होशियार कर दिया,
आबजू जरा-सी थी ऐ मुहीते बेकरां,
तूने करके हमकिनार बेकिनार कर दिया!
मेरे दिल को दोस्त ने लालाजार कर दिया!
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हम बुरे ही सही
अच्छा भी मिलेगा अब कौन
यूं नहीं करते हैं
हर बात पर झगड़ादेखो!
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कौन दुनिया पर भला तकिया करे
है सहारा एक तेरे नाम का
जो भी हूं हूं तेरी रहमत के तुफैल
वर्ना था मैं आदमी किस काम का
खुम पै खुम देता चला जा साकिया
काम सोहबत में तेरी क्या जाम का
जादे राह लेकर चलें ऐ हमसफर
नाम हो अल्लाह का या राम का
दूर जाना है हमें आगे बढ़ो
वक्त आएगा बहुत आराम का
तू उठा कर देख तो अपनी नजर
किस कदर दिलकश है जल्वा बाम का।
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मेरी वीरानी को वीरानी-ए-सहारा न समझ
सौ बहारें लिए दामन में खिजां मेरी है
नगम्मी गम की है और दर्द का है सरूद
बस रही है सोजे तरन्नुम में फगां मेरी है
हिज्र में एक नहीं कितने जन्म बीत गए
वायदा वस्ल से उम्मीद जवां मेरी है
देखी हैं लाखों बहारें मेरी आंखों ने मगर
हुई आखिर नजर अफरोज खिजां मेरी है
अर्श से चंद कदम आगे हे मस्तों का मुकाम
मंजिल इश्क समझता हूं कहां मेरी है
जिन फिजाओं में जरूरत नहीं है बालो पर की
गाहे-गाहे हुई परवाज वहां मेरी है
मेरी हस्ती है तेरे दम से जहां में कायम
तेरी हस्ती का तकाजा है न जां मेरी है
कहलवाता है जो तू बस वही कह सकता हूं
कहने को यूं तो भला जबां मेरी है
मेरी वीरानी को वीरानी-ए-सहारा न समझ।
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