Tuesday, 2 June 2015

हंसा तो मोती चूने–(संत लाल) ओशो–प्रवचन–04

नहीं कहीं मिलती है छांव!
नहीं कहीं रुकते हैं पांव!
राह अजानी, लोग अजाने,
जितने भी संयोग अजाने,
अनजाने से मिली मुझे जो
भूख अजानी, भोग अजाने!
एक भुलावा कडुवा -मीठा,
एक छलावा ठांव-कुठांव,
जिसको समझूं अपनी मंजिल
नहीं कहीं दिखता वह गांव,
नहीं कहीं रुकते है पांव!
किसे कहूं मैं अपना मीत?
किसे कहूं मैं अपनी जीत?
नित्य टूटते रहते सपने,
नित्य बिछडते रहते अपने,
एक जलन लेकर प्राणों में
मैं आया हूं केवल तपने!
वर्तमान हो या भविष्य हो
बन जाता है विवश अतीत।
और शून्य में लय हो जाते
सुख-दुख के ये जितने गीत!
किसे कहूं मैं अपना मीत?
किसे कहूं मैं अपनी जीत!
एक सांस है सस्मित चाह।
एक सांस है आह-कराह!
बडी प्रबल है गति की धारा।
मैं पथभूला, मैं पथहारा।
जिसको देखा वही विवश है-
किसको किसका कौन सहारा?
रंग-बिरंगे स्वप्न संजोए
मेरे उर का तमस अथाह-
ज्यों- ज्यों घटती जाती दूरी
त्यों -त्यों बढ़ती जाती राह!
एक सांस है सस्मित चाह,
एक सांस है आह-कराह!
कब बुझ पाई किसकी प्यास?
और सत्य कब हास -विलास?
नहीं यहां पर ठौर-ठिकाना।
सुख अनजाना, दुख अनजाना
पग-पग पर बुनता जाता है
काल-नियति का ताना-बाना!
मेरे आगे है मरीचिका।
मेरे अंदर है विश्वास,
जो कि मृत्यु पर चिरविजयी है
वह जीवन है मेरे पास!
मेरा जीवन केवल प्यास।
यही प्यास है हास -विलास!
नहीं कहीं मिलती है छांव।
नहीं कहीं रुकते हैं पांव!
राह अजानी, लोग अजाने,
जितने भी संयोग अजाने,
अनजाने से मिली मुझे जो
भूख अजानी, भोग अजाने!
एक भुलावा कडुवा -मीठा,
एक छलावा ठांव-कुठांव,
किसको समझूं अपनी मंजिल
नहीं कहीं दिखता वह गांव,
नहीं कहीं मिलती है छांव,
नहीं कहीं रुकते हैं पांव!
…………………………………..
नजर तुम्हारी जाली है,
सिक्का तो टकसाली है!
इस सिक्के को गढ़ा प्रकृति ने है धरती की माटी से।
इस सिक्के को गढ़ा पुरुष ने अपनी ही परिपाटी से।
इस सिक्के पर अंक पड़े हैं स्वयम नियति के हाथों से,
यह सिक्का तो चलता आया जनम- मरण की घाटी से!
इसे बजाओ, यह गाता है
गीत खुशी के, मातम के
इस सिक्के में दोष देखना
केवल खाम- ख्याली है!
सिक्का तो टकसाली है!
माल तुम्हारा खोटा है
यह ग्राहक तो बहुत खरा
यह ग्राहक पीठ बोलों पर मिसरी-सा घुल जाता है!
थोड़ी-सी ममता पाने को निज सर्वस्व लुटाता है!
जो छल-कपट देखते हो तुम वह तो सभी तुम्हारे हैं-
इस गाहक की सच्चाई से जनम-जनम का नाता है!
अपने अंदर की करुणा को
लो कर के तो परखो तुम!
इस गाहक का हाथ खुला है
इस गाहक का हृदय भरा!
तुम आए हो नए-नए।
यह तो हाट पुरानी है!
सोना -चादी, हीरा-मोती, कितने इसमें छले गए।
जीवन भर बटोरने वाले खाली हाथों चले गए!
सुख-दुख की यह हाट अनोखी, इसमें बिकता यश- अपयश
पाने वाले सदा पुराने, देने वाले नित्य नए!
तुम तो अपने में ही उलझे,
आंख खोल के देखो तो!
जो निज को जितना दे सकता
वह उतना ही ज्ञानी है!
यह तो हाट पुरानी है!
कितने चालाक
तुम बनो, दुनिया भोली- भाली है!
पल में रोना, पल में हंसना,
यह दुनिया तो सहज-सरल,
उत्सुकता अस्तित्व यहां पर,
जीवन तो है कौतूहल!
सत्य स्वप्न है, स्वप्न सत्य है-इन दोनों में अंतर क्या?
इने -गिने विश्वासों पर ही इस दुनिया की चहल-पहल!
जो मिलता है लेना होगा राजी से, नाराजी से!
अरे व्यर्थ की तीन- पाच यह और व्यर्थ की गाली है।
दुनिया भोली- भाली है!
नजर तुम्हारी जाली है
सिक्का तो टकसाली है!
नजर बदलनी है। जो तुम्हरे भीतर है, परम धन है। जरा भूल-चूक नहीं है। यह अस्तित्व जैसा होना चाहिए वैसा ही है; इसमें जरा भी विसंगति नहीं। यह अस्तित्व तो अपूर्व उत्सव है। तुम अंधे, तुम लंगड़े, तुम लूले। नाच न आवै आँगन टेढ़ा!
नजर तुम्हारी जाली है,
सिक्का तो टकसाली है!
इस सिक्के को गढ़ा प्रकृति ने है धरती की माटी से।
इस सिक्के को गढ़ा पुरुष ने अपनी ही परिपाटी से।
इस सिक्के पर अंक पसे हैं स्वयम नियति के हाथों से
यह सिक्का तो चलता आया जनम- मरण की घाटी से!
इस बजाओ, यह गाता है
गीत खुशी के, मातम के
इस सिक्के में दोष देखना
केवल खाम- ख्याली है!
सिक्का तो टकसाली है!
नजर तुम्हारी जाली है।
…………………………………………
बुझ गई न जो बन एक आह अधरों पर
ऐसी तो कोई चाह नहीं जीवन में!
मेरे पैरों को मिली थकन की सीमा
मेरे मस्तक को गुरुता की नादानी!
दिल में घिर आया करता एक धुआं-सा
आंखों में घिर आता है अकसर पानी!
अनजानी दुनिया का अनजाना कम है
अनजाना -सा ही सकल ज्ञान औ भ्रम है
अनजान दिशा का मैं अनजाना पंथी
केवल असफलता ही जानी-पहचानी!
खो गई न हो जो अंधकार में सहसा
ऐसी तो कोई राह नहीं जीवन में!
उल्लास-तरगों से जो अधर विचुबित
वे लिए हुए हैं चुभती जलन तृषा की
आंसू में उमड़ा जो अभाव का सागर
उसमें ही लहरें हैं छवि की, सुषमा की!
मेरे पीछ अगनित खंडहर के क्रंदन मेरे
आगे बस धुधला -सा सूनापन
यह राग-रंग, यह चहल-पहल सब कुछ है
पर अपने अंदर मैं कितना एकाकी!
पल- भर का जो अवलंब मुझे दे सकती
ऐसी तो कोई थाह नहब जीवन में!
जिसको देखा वह खोया अपनेपन में
जिसको पाया वह बेसुध यहां जलन में
पागल-सा मैंने दर -दर अलख जगाया
जिससे पूछा है वही एक उलझन में।
प्रत्येक मौन में कुछ घुटता-सा भय है
प्रति स्वर में कुछ कापता हुआ संशय है
कितने निःश्वासों से बोझिल है धरती
हैं डूब चुके कितने उच्छवास गगन में।
विचलित कर सकती जो कि नियति के कम को
ऐसी तो कोई आह नहीं जीवन में
इस जीवन में बचाने योग्य क्या है?
बुझ गई न जो बन एक अधरों पर
ऐसी तो कोई चाह नहीं जीवन में!
खो गई न हो जो अंधकार में सहसा
ऐसी ततो कोई राह नहीं जीवन में!
पल भर जो अवलंब मुझे दे सकती
ऐसी तो कोई थाह नहीं जीवन में!
विचलित कर सकती जो नियति के कम को
ऐसी तो कोई आह नहीं जीवन में
………………………………………………….
पीने दे! पीने दे ओ!
यौवन मदिरा का प्याला!
मत याद दिलाना कल की;
कल है कल आने वाला।
है आज उमंगों का युग-
तेरी मादक मधुशाला!
पीने दे जी भर रूपसि
अपने पराग की हाला!
ले कर अतृप्त तृष्णा को
आया हूं मैं दीवाना,
सीखा ही नहीं यहां है
थक जाना या छक जाना,
यह प्यास नहीं बूझने की
पी लेने दे मन माना,
बस मत कर देना रूपसि
बस करनाहै पर जाना।
………………………………………..
मानापमान हो इष्ट तुम्हें
मैं तो जीवन को देख रहा!
मैं देख रहा दानवता के
दुःसाहस के विकराल कृत्य,
मैं देख रहा बर्बरता का
भू की छाती पर नग्न नृत्य,
मैं देख रहा उठने वाली
अम्बर पर संसृति की उसांस,
मैं देख रहा यह मानवता
कितनी निर्बल कितनी अनित्य!
जमघट है रोने वालों का,
जमघट है गाने वालों का,
सब देने को लाए थे पर
जमघट है पाने वालों का,
कुछ बने लुटेरे लूट रहे
कुछ बने भिखारी लूट रहे है
जमा मिटाने को ही यह
जमघट मिट जाने वालों का
मैं जग को सुख देने वाले
जग के क्रन्दन को देख रहा
मानापमान हो इष्ट तुम्हें मैं
तो जीवन को देख रहा!
तुम साक्षी बनो।
…………………………………
 
 

हंसा तो मोती चूने–ओशो (प्रवचन–03)

तुमने गति का संघर्ष दिया मेरे मन को,
सपनों को छवि के छवि के इंद्रजाल का सम्मोहन,
तुमने आंसू की सृष्टि रची है आखों में
अधरों को दी है शुभ्र मधुरिमा की पुलकन!
उल्लास और उच्छवास तुम्हारे ही अवयव
तुमने मरीचिका और तृषा का सृजन किया
अभिशाप बना कर तुमने मेरी सत्ता को
मुझको पग-पग मिटने का वरदान दिया।
मैं हंसा तुम्हारे हंसते -से संकेतों पर
मैं फूट पड़ा लख बैक भृकुटि का संचालन
अपनी लीलाओं से हे विस्मित और चकित!
अर्पित मेरी भावना-इसे स्वीकार करो!
अर्पित है मेरा कर्म-इसे स्वीकार करो।
क्या पाप और क्या पुण्य? इसे तो तुम जानो
करना पड़ता है, केवल इतना शांत यहां।
आकाश तुम्हारा और तुम्हारी ही पृथ्वी
तुममें ही तो इन सासों का आघात यहां।
तुममें निर्बलता और शक्ति इन हाथों की
मैं चला कि चरणों का गुण केवल चलना है
ये दृश्य रचे, दी वही दृष्टि तुमने मुझको
मैं क्या जानूं क्या सत्य और क्या छलना है।
रच- रच कर करना नष्ट तुम्हारा ही गुण है
तुममें ही तो है कुण्ठा इन सीमाओं की
हे निज असफलता और सफलता से प्रेरित!
अर्पित है मेरा कर्म-इसे स्वीकार करो!
अर्पित मेरा अस्तित्व-उसे स्वीकार करो!
रंगों की सुषमा रख मधुऋतु जब जाती है
सौरभ बिखरा कर फूल धूल बन जाता है
धरती की प्यास बुझा जाता गल कर बादल
चट्टानों से टकरा कर निर्झर गाता है!
तुमने ही तो पागलपन का संगीत दिया
करुणा वन गलना तुमने मुझको सिखलाया
तुमने ही मुझको यहां धूल से ममता दी
रंगों में जलना मैंने तुमसे ही पाया!
उस ज्ञान और भ्रम में ही तो तुम चेतन हो।
जिनसे मैं बरबस उठता-गिरता रहता हूं
निज खण्ड-खण्ड में हे असीम, तुम हे अखण्ड
अर्पित मेरा अस्तित्व-इसे स्वीकार करो! झुकों!
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कुछ बैठ गये थोड़ा चलकर,
प्रियतम, इस पथ में पांव न दो,
चलते -चलते थक जाओगे।
मैं आज प्रणय-पथ में आयी,
मन में सुख के सपने लायी,
पर इसका कुछ भी ठीक नहीं-
कल कौन तुम्हारे मन भायी?
यह ज्ञात नहीं, इस जीवन में
तुम किस -किसके कहलाओगे?
मानव का मन ही है चंचल,
अपने से भी करता है छल,
दो छींटों से बुझ जाता है,
विक्षिप्त धधकता विरहानल
तुम भी तृणवत् मन के गति
के हलकोरों में बह जाओगे।
मैं तुम से प्रियतम कहती हूं
तुम ज्यादा हो, कम कहती हूं मैं,
किन्तु प्रणय के बन्न्धन को,
सच पूछो तो भ्रम कहती हूं
तुम सुख के सुन्दर धोखे में
उर को कब तक उरझाओगे?
तुम प्यार नहीं कर पाओगे।
तुम नश्वर हो तो भावों में
अमरत्व कहां से लाओगे?
तुम प्यार नहीं कर पाओगे।
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ये बियाबान मेरे वास्ते बने होंगे
इनकी रौनक न बढाऊं तो किधर जाऊंगा
सर्द रातों में चिलकती हुई धूपों के तले
मैं न गाऊंगा तो मर जाऊंगा।
बरहा मुझको सफर करना है
राह मैं आग बिछा दो तो भी तर जाऊंगा
तुमने जिस राह पर अपनी हो बनायी मंजिल
ताउम्र भूल से उस राह नहीं जाऊंगा।
चंद सांसों की सलामी में जिंदगी खो दूं
ऐसा सौदा तो सासों का न कर पाऊंगा
कोई अपना तो नहीं रात के सायों के सिवा
काले सूरज को उजाले तो न दे पाऊंगा।
तुमने छीनी हैं जो मुझसे वो सुनहरी किरणें
उनकी स्याही में बहुत गहरे उतर जाऊंगा
फिर न मैं लौट के उस गांव कभी आऊंगा
अब ना मातम तेरे जाने का मैं मनाऊंगा।
कसम जो कि हो गयी बात, एक खेल से
छुटकारा हुआ। समय रहते छुटकारा हुआ
चंद सांसों की सलामी में जिंदगी खो दूं
ऐसा सौदा तो में सांसों का न कर पाऊंगा।
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मेरे ये चरण जो कि पग-पग पर कम्पमान
मेरा यह मस्तक है जिसका अभिशाप ज्ञान
मेरे ये हाथ जो कि फैले हैं अंजलि बन
मेरा ये उरउठना-गिरनाजिसका विधान!
इनमें ही मेरे अस्तित्व का पराभव है
अपनी सीमा से उठ सकना कब सम्भव है?
मेरे आगे जो अनजाना-सा है प्रसार
इसमें किसकी सत्ता, है किसका अहंकार?
टेढ़े मेढ़े अगणित पथ अगणित लोगों के
किन्तु निगल लेता है प्रति पथ को अंधकार!
ज्ञात है मुझे-तुम कह दोगे, ‘यह सपना है!
पर मैं पंथी हूं पथ मेरा भी अपना है!
खिलना-कलियों का गुण, मुरझाना-फूलों का
टूट -टूट कर फिर -फिर चुभ-चुभ जाना शूलों का
गुण उसका जो कुछहै, निर्गुण अस्तित्वहीन
मेरे जीवन का गुण-संचय है भूलों का!
मेरा विश्वास शिथिल, मेरा स्वर धीमा है
अपराजित अंधकार, ज्ञान एक सीमा है!
मेरे सपनों में हंस -हंस पड़ते नव -प्रभात
मेरे संघर्षों में धुंधली-सी निहित रात
मेरे चरणों पर लहराते हैं सप्त सिंधु
मेरे मस्तक पर मंडराते आकाश सात!
क्षिति की प्राचीरों से मुझको टकराना है
मेरे आगे सुख-दुख का ताना-बाना है?
शशि में शीतलता है,रवि में है असह ताप
अलि में गुन-गुन गुंजन, कोयल में है प्रलाप!
मेरे होठों पर हिम, उर में अंगारे हैं
अपनी सासों में मैं युग-युग की लिये माप!
सासों का स्रोत कहां? युग भी अनजाना है
मैं कहता- कब मैंने निज को पहचाना है?
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तुम बहते जाना, बहते जाना, बहते भाई!
तुम शीश उठा कर सरदी-गरमी सहते जाना भाई!
सब यहां कह रहे हैं रो- रो कर अपने दुख की बातें!
तुम हंसकर सब के सुख की बातें कहते जाना भाई!
भ्रम रहे यहां पर हैं बेसुध-से सूरज, चांद, सितारे
गल रही बरफ, चल रही हवा, जब रहे यहां अंगारे
है आना-जाना सत्य, और सब झूठ यहां पर भाई
कब रुकने पाये झुकने वाले जीवन पर बेचारे?
तुम किस पर खुश हो गये और तुम बोलो किस पर रूठे?
जो कल वाले थे स्वप्न सुनहले आज पड़ चुके झूठे!
है यह कांटो की राह विवश-सा सबको चलते रहना
जो स्वयम् प्रगति बन जाए उसी के स्वप्न अपूर्व अनूठे!
तुम जो देते हो मानवता को आठों याम चुनौती
तुम महल खजानों को जो अपनी समझे हुए बपौती!
तुम कल बन कर रजकण पैरों से ठुकराये जाओगे।
है कौन यहां पर ऐसा जो खा आया हो अमरौती?
यह रंग-बिरंगी उषा लिये है दुख की काली रातें
हैं ग्रीष्म-काल की दाहक लपटों में रस की बरसाते!
यह बनना-मिटना अमिट काल के चल-चरणों का कम है, छाया के चित्रों सदृश यहां हैं ये सुख-दुख की बातें।
रुकना है गति का नियम नहीं, तुम चलते जाना भाई
बुझना प्राणों का नियम नहीं, तुम जलते जाना भाई!
हिम-खण्ड सदृश तुम निर्मल, शीतल, उज्ज्वल यश भागी
जमना आंसू का नियम नहीं, तुम गलते जाना भाई!
तुम बहते जाना, बहते जाना बहते जाना भाई!
तुम शीश उठा कर सरदी-गरमी सहते जाना भाई!
सब यहां कह रहे हैं रो- रो कर अपने दुख की बातें!
तुम हंसकर सब के सुख की बातें कहते जाना भाई!
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हंसा तो मोती चूने–ओशो ( प्रवचन–02)

किसने कहा-वह फूल है?
किसने कहा-वह शूल है?
प्रात: हुई-सब रूप है,
प्रात: हुई-सब रंग है,
दिन का प्रकाश उछाह है,
दिन का प्रकाश उमंग है।
पर मौन सूनी सी अमा,
निज नास्ति की ले कालिमा,
निःश्वास भर कर कह उठी-
जो कुछ यहां वह भूल है!
तब चेतना ने ज्ञान ले
नभ पर यहां मानव चढ़ा
रवि-शशि बने उसके नयन,
निःसीम को उसने गढ़,
पर वह अचानक रुक गया,
पर शीश उसका झुक गया,
ले गोद में उसका धरा
ने कह दिया- तू धूल है!
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वह एक छोटा-सा विहग
अपनी उमंगों से उमैं
निज पंख फैला चल पड़ा
उस नील नभ को नापने!
उर में भरा उल्लास था,
स्वर में भरा उच्छ्वास था
संगीत जीवन का रचा
उसकी विसुध प्रति सांस ने!
थे मौन गिरी-पर्वत खड़े
थे मौन वन -उपवन पड़े
वह गा रहा, वह जा रहा,
था सामने, बस सामने!
ऊंचा अधिक उड़ता गया,
ओझल हुई उससे धरा,
पर सामने निःसीम था,
उसके लगे पर कापने!
में तो संन्यास की यात्रा सुगम मालूम होती है, सरल मालूम होती है। शुरू-शुरू में तो ध्यान शांतिदायी। शुरू- शुरू होता है।
लेकिन एक ऐसी घड़ी
आती है उड़ते -उड़ते
ऊंचा अधिक उड़ता गया,
ओझल हुई उससे धरा,
पर सामने निःसीम था,
उसके लगे पर कापने!
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तेरे लिए ही मैं सरजाई
मैं तो पर गई ओ हरजाई!
तूने बांधी महा सगाई
मैं तो पर गई ओ हरजाई!
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कितना मोहक रूप,
नयन ही बतलाके,
कितनी पागल प्यार,
सपन ही समझाएंगे।
हर पपड़ी है एक जलाधि
की शेष निशानी,
कितनी गहरी प्यास, अधर से जान सकोगे।
चरणों का इतिहास डगर से जान सकोगे।
पल-पल का है साथ,
मगर पल-पल की दूरी,
फीका स्वर्ण -प्रभात,
विफल संध्या सिंदूरी।
तन छूती जलधार
मगर जीवन रेतीला,
तट के मन की पीर लहर से जान सकोगे।
चरणों का इतिहास डगर से जान सकोगे।
संध्या की थाली में
कितने दीप हैसे थे,
पावस की स्याही ने
कितने दीप डसे थे!
किस कुर्बानी ने
सूरज की भाग्य लिखा था-
ऊषा की रंगीन नजर से जान सकोगे।
चरणों का इतिहास डगर से जान सकोगे।
प्रतिभा वाले बीज
अंगारों में पलते हैं।
गीतों वाले फूल
अश्रु-तट पर खिलते हैं।
मधुर मिलन का पता
विरह-पुर में पाओगे,
मधु-मदिरा का मोल जहर से जान सकोगे।
चरणों का इतिहास डगर से जान सकोगे।
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हंसा तो मोती चूने–संत लाल (ओशो) प्रवचन–01

कही से आग मिले
इस बरफीली जगह में
कहीं से आच मिले
इस ठंडे शहर में
कहीं से राग उठे
इस वीराने में
कहीं शहनाई बजे
इस मनहूस मरघटी जमाने में
कहीं आम का पेड़ बौराये
सुनसान को तोड़े कोयल
हवा तेज और तेज चले
गले लगे शरमाये
दोपहरी भन्नाती है
धूप गरम और- और गरमाती है
मैं रुकी हूं अभी भी
किसी शाम के लिए
ये वक्त ठहरे ठहर जाये
किसी लिये गये नाम के लिए
कहीं से आग मिले
इस बरफीली जगह में
कहीं से आंच मिले
इस ठंडे शहर में कहीं से रण उठे
इस वीराने में
कहीं शहनाई बजे
इस मनहूस मरघटी जमाने में
...........................................
अंतिम निमंत्रण आज है!
वरदान पाने के लिए,
निर्माण पाने के लिए,
युग-युग तुम्हारे पास पंछी नीड़ में आता रहा
अंतिम निमंत्रण आज है!
लघु श्वास के दो तार पर,
विश्वास के आधार पर,
जड़ विश्व के चेतन नियम हंस भूल ठुकराता रहा;
अंतिम निमंत्रण आज है!
संतोष पलकों से ढुलक,
बहता रहा था शाम तक,
नीरव निशा के शून्य में दृग-सिंधु यह गाता रहा।
वो दिन होगा जहां के गम न होंगे
...................................................
वो दिन जब इस जहां में हम न होंगे
ये नूर-ओ-नार-ओ नग्मा सब रहेंगे
तेरी दुनिया में लेकिन हम न होंगे।
झुके होंगे जो उनके आस्तां पर,
वो कोई और होंगे हम न होंगे।
फकत यह जानने में उस गुजरी,
वो कैसे और कब बरहम न होंगे।
बहुत होंगे मेरे अरमान पूरे,
मेरे अरमान फिर भी कम न होंगे।
चले हैं अश्कइक्याल-ए-गूनह को
गुनाह उनके मगर यूं कम न होंगे।
..................................................................................
हमको दुश्नाम की खू है, तू मगर देख कहीं
शहद होंठों का तेरे जहरे -हलाहिल न बने।
तुन्दी-ए -शौक में तुफान से लड़ने वाले,
मसलहतकोशी-ए -साहिल तेरी मंजिल न बने।
जिस सफीने के मुकद्दर में तलातुम ही नहीं
वो शनासा-ए -रमूज -ए -लब -ए -साहिल न बने।
चारा-ए -दर्द -ए-जिगर, मरहम -ए आजार बने
जो नजर तेरी खूदा-रा सम्म-ए- कातिल न बने।
हाय क्या दौर है, पहलू में धड़कती हुई शै
संग या खार बने दर्द भरा दिल न बने।
अपनी किस्मत को सराहे या गिला करते रहे
जो कभी तीर -ए -नजर का तेरे घायल न बने।
 
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